मनीषा शर्मा। राजस्थान के उदयपुर स्थित पूर्व मेवाड़ राजपरिवार में लंबे समय से चल रहा संपत्ति विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। यह मामला पूर्व राजपरिवार के वरिष्ठ सदस्य अरविंद सिंह मेवाड़ की वसीयत को लेकर है, जिसे उनके बेटे लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ और बेटी पद्मजा कुमारी परमार के बीच चुनौती दी गई है। विवाद का केंद्र सिटी पैलेस, एचआरएच होटल्स ग्रुप और अन्य कीमती पारिवारिक संपत्तियां हैं, जिनकी मालिकी और नियंत्रण को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने हैं।
सिटी पैलेस और एचआरएच होटल्स ग्रुप पर टकराव
इस विवाद में सिटी पैलेस उदयपुर और एचआरएच ग्रुप ऑफ होटल्स जैसी ऐतिहासिक और व्यावसायिक रूप से अहम संपत्तियां शामिल हैं। लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ को मेवाड़ राजपरिवार का उत्तराधिकारी माना जाता है और वे एचआरएच होटल्स ग्रुप के मालिक भी हैं। दूसरी ओर उनकी बहन पद्मजा कुमारी परमार का कहना है कि वसीयत में उनके अधिकारों की अनदेखी की गई है। इसी कारण दोनों पक्ष अदालत का दरवाजा खटखटा चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट में वसीयत को चुनौती
मामले में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने जानकारी दी कि याचिकाकर्ता अरविंद सिंह मेवाड़ के परिवार से हैं, जो महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ के उत्तराधिकारी थे। परिवार के भीतर उत्तराधिकार और वसीयत की वैधता को लेकर गंभीर मतभेद हैं। अरविंद सिंह मेवाड़ की वसीयत को लेकर उठे सवालों ने इस विवाद को और जटिल बना दिया है।
अलग-अलग अदालतों में दायर थीं याचिकाएं
लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने मुंबई हाईकोर्ट में लंबित मामलों को राजस्थान हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की थी। वहीं उनकी बहन पद्मजा कुमारी परमार ने जोधपुर बेंच राजस्थान हाईकोर्ट में लंबित मामलों को बॉम्बे हाईकोर्ट भेजने का आग्रह किया था। अलग-अलग अदालतों में चल रहे इन मामलों के कारण कानूनी प्रक्रिया और उलझ गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सभी संबंधित मामलों को दिल्ली हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि दोनों पक्षों के बीच और कोई मामले लंबित हैं, तो उन्हें भी दिल्ली हाईकोर्ट में ट्रांसफर कराने के लिए आवेदन किया जा सकता है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 जनवरी को दिल्ली हाईकोर्ट में होगी।
मेवाड़ राजपरिवार में दशकों पुराना विवाद
मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार में संपत्ति विवाद कोई नया मामला नहीं है। महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ के तीन संतानें थीं—महेंद्र सिंह मेवाड़, अरविंद सिंह मेवाड़ और बेटी योगेश्वरी कुमारी। वर्ष 1983 में भगवत सिंह मेवाड़ ने पारिवारिक संपत्तियों को बेचने और लीज पर देने का फैसला किया था। इस निर्णय से बड़े बेटे महेंद्र सिंह असहमत थे और उन्होंने अपने पिता के खिलाफ अदालत का रुख किया।
वसीयत और उत्तराधिकार ने बढ़ाया विवाद
बड़े बेटे से नाराज होकर भगवत सिंह मेवाड़ ने अपनी वसीयत और संपत्ति से जुड़े फैसलों की जिम्मेदारी छोटे बेटे अरविंद सिंह मेवाड़ को सौंप दी। इसके बाद महेंद्र सिंह मेववाड़ को ट्रस्ट और अधिकांश संपत्तियों से लगभग बाहर कर दिया गया। 3 नवंबर 1984 को भगवत सिंह मेवाड़ के निधन के बाद यह विवाद और गहरा गया और कानूनी लड़ाई दशकों तक चलती रही।
37 साल बाद आया था जिला अदालत का फैसला
करीब 37 वर्षों की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद वर्ष 2020 में उदयपुर की जिला अदालत ने एक अहम फैसला सुनाया। अदालत ने विवादित संपत्तियों को चार हिस्सों में बांटने का आदेश दिया। एक हिस्सा भगवत सिंह मेवाड़ के नाम और शेष तीन हिस्से उनकी तीनों संतानों के बीच बांटने के निर्देश दिए गए। इस फैसले के बावजूद विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका।
संपत्तियों पर लगी थी आर्थिक गतिविधियों की रोक
अदालत के आदेश तक अधिकांश संपत्तियां अरविंद सिंह मेवाड़ के कब्जे में रहीं, जबकि महेंद्र सिंह मेवाड़ और उनकी बहन योगेश्वरी कुमारी को सीमित हिस्सेदारी मिली। कोर्ट ने शंभू निवास पैलेस, बड़ी पाल और घासघर जैसी संपत्तियों से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों पर भी तत्काल रोक लगा दी थी, ताकि संपत्तियों की स्थिति यथावत बनी रहे।


