राजस्थान के टोंक जिले के ऐतिहासिक आवां कस्बे में हर वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित होने वाला विश्व प्रसिद्ध दड़ा महोत्सव एक बार फिर अपने रंग में आने को तैयार है। 14 जनवरी को मनाए जाने वाले इस पारंपरिक महोत्सव की तैयारियां इन दिनों पूरे जोर-शोर से चल रही हैं। राजपरिवार के संरक्षण में आयोजित इस आयोजन के लिए गढ़ पैलेस में पिछले करीब 15 दिनों से दक्ष कारीगर दड़ा निर्माण के कार्य में जुटे हुए हैं।
राजपरिवार के संरक्षण में होता है आयोजन
दड़ा महोत्सव का आयोजन आवां के राजपरिवार द्वारा परंपरागत रूप से किया जाता है। इस वर्ष भी राजपरिवार की महारानी विजया देवी और कुंवर कार्तिकेय सिंह के मार्गदर्शन में महोत्सव को पूरी शाही गरिमा और पारंपरिक उत्साह के साथ आयोजित किया जाएगा। आयोजकों के अनुसार, यह महोत्सव केवल एक खेल नहीं बल्कि सदियों पुरानी विरासत और ग्रामीण संस्कृति का जीवंत प्रतीक है।
70 किलो का दड़ा, 15 दिन की मेहनत
दड़ा बनाने की प्रक्रिया अपने आप में अनोखी और श्रमसाध्य होती है। लकड़ी के बुरादे, बजरी और टाट से तैयार किया जाने वाला यह फुटबॉलनुमा दड़ा करीब 70 किलो वजन का होता है। इसे आकार देने और मजबूती प्रदान करने में लगभग 15 दिन की कड़ी मेहनत लगती है। तैयार होने के बाद दड़े को पानी में भिगोया जाता है, जिससे वह और अधिक मजबूत व सख्त हो जाता है। वर्तमान में आवां के अनुभवी ग्रामीण और कारीगर इस विशेष कार्य में लगे हुए हैं।
हजारों खिलाड़ी, एक किलोमीटर लंबा मैदान
दड़ा महोत्सव का खेल गांव के बीच स्थित गोपाल चौक से शुरू होता है। यह खेल देखने में आधुनिक फुटबॉल जैसा जरूर लगता है, लेकिन इसकी खासियत यह है कि इसमें खिलाड़ियों की संख्या हजारों में होती है। खेल के दो गोल पोस्ट अखनियां दरवाजा और दूनी दरवाजा होते हैं, जिनकी आपसी दूरी लगभग एक किलोमीटर है। करीब 20 गांवों के तीन हजार से अधिक लोग इस खेल में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं।
छतों से देखते हैं दस हजार दर्शक
दड़ा महोत्सव के दिन पूरा आवां कस्बा उत्सव में डूब जाता है। अनुमान के अनुसार, लगभग दस हजार दर्शक अपने मकानों की छतों, गलियों और गोपाल चौक में खड़े होकर इस अद्भुत खेल का आनंद लेते हैं। युवा, बुजुर्ग और बच्चे सभी इस आयोजन को लेकर खासा उत्साह दिखाते हैं।
दड़ा करता है वर्षा और सुकाल की भविष्यवाणी
दड़ा महोत्सव से जुड़ी एक रोचक मान्यता भी है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यदि दड़ा खेल के दौरान दूनी दरवाजे की ओर चला जाता है, तो आने वाले वर्ष में अच्छी बारिश होती है और सुकाल रहता है। वहीं, यदि दड़ा अखनियां दरवाजे की ओर जाता है, तो उसे अकाल का संकेत माना जाता है। इसी कारण यह खेल केवल मनोरंजन नहीं बल्कि आस्था से भी जुड़ा हुआ है।
सैनिकों की भर्ती से हुई थी परंपरा की शुरुआत
आवां के युवा सरपंच दिव्यांश महेंद्र भारद्वाज के अनुसार, इस खेल की शुरुआत करीब एक शताब्दी पहले राव राजा सरदार सिंह ने की थी। उस समय इसका उद्देश्य सेना के लिए वीर और सक्षम युवाओं का चयन करना था। समय के साथ यह परंपरा विकसित होकर आज एक भव्य महोत्सव का रूप ले चुकी है, जो राजस्थानी शौर्य, संस्कृति और एकता का प्रतीक बन गया है।


