राजस्थान क्रिकेट की राजनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA)को ट्रस्ट में बदलने की कथित कोशिशों को लेकर विधानसभा में तीखी बहस देखने को मिली। पिछले दो वर्षों से आरसीए की निर्वाचित कार्यकारिणी भंग है और उसके स्थान पर एडहॉक कमेटी काम कर रही है। इसी मुद्दे को लेकर विपक्ष ने सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए मुख्यमंत्री से जवाब मांगा है।
नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने विधानसभा में सवाल उठाते हुए कहा कि आरसीए के चुनाव हुए दो साल का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक नई कार्यकारिणी का गठन नहीं हो सका है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर चुनाव टाल रही है, जबकि राज्य में क्रिकेट संचालन को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।
चुनाव में देरी और BCCI बैन की आशंका
विधानसभा में चर्चा के दौरान जूली ने यह भी कहा कि यदि समय रहते आरसीए के चुनाव नहीं कराए गए तो Board of Control for Cricket in India द्वारा प्रतिबंध लगाने की नौबत आ सकती है। उनका दावा था कि बीसीसीआई राज्य इकाई की स्थिति पर नजर रखे हुए है और लगातार अस्थिरता से राज्य क्रिकेट को नुकसान हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जयपुर स्थित सवाई मानसिंह स्टेडियम में राज्य सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन संस्था के लोकतांत्रिक ढांचे को बहाल करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। उनके अनुसार, यदि चुनाव नहीं कराए गए तो राज्य के खिलाड़ियों और क्रिकेट ढांचे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
ट्रस्ट में बदलने के प्रस्ताव पर विवाद
विवाद की जड़ में आरसीए को सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत कराने का प्रस्ताव है। जानकारी के अनुसार, एडहॉक कमेटी के मौजूदा संयोजक दीनदयाल कुमावत ने राजस्थान सार्वजनिक न्यास अधिनियम-1959 के तहत आरसीए को ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत करने के लिए आवेदन दिया है। आवेदन में संस्था की चल-अचल संपत्तियों, बैंक खातों और अन्य परिसंपत्तियों को ट्रस्ट संपत्ति के रूप में दर्शाने का उल्लेख किया गया। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम खेल मंत्री को दरकिनार कर उठाया गया और इसके पीछे राजनीतिक उद्देश्य हो सकते हैं। टीकाराम जूली ने कहा कि आरसीए को देवस्थान विभाग में पंजीकृत कराने की चर्चा समझ से परे है और यह खेल प्रशासन की मूल भावना के खिलाफ है।
कानूनी स्थिति पर RCA का पक्ष
इस पूरे प्रकरण पर आरसीए के चार्टर्ड अकाउंटेंट श्याम अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि संस्था की कानूनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि आयकर अधिनियम-1961 की धारा 12ए और 12एबी के तहत आयकर छूट प्रक्रिया से संबंधित एक नोटिस मिला है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का संदर्भ दिया गया है।
अग्रवाल के अनुसार, उक्त निर्णय में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं किया गया कि प्रत्येक सोसायटी को ट्रस्ट में बदला जाए या खेल संस्था की संपत्ति ट्रस्ट को हस्तांतरित की जाए। उन्होंने साफ कहा कि न तो किसी संपत्ति का ट्रांसफर हुआ है और न ही संस्था के संविधान में कोई संशोधन किया गया है। आरसीए पहले की तरह अपने संविधान और साधारण सभा के अधीन ही संचालित हो रही है।
सहकारी संस्था बनाम ट्रस्ट मॉडल
वर्तमान में आरसीए एक विधिवत पंजीकृत सहकारी संस्था है, जो राजस्थान सहकारी समितियां अधिनियम और राजस्थान खेल अधिनियम-2005 के तहत कार्य करती है। संस्था के नीतिगत और संपत्ति संबंधी निर्णय लेने का अधिकार उसकी साधारण सभा को प्राप्त है। ऐसे में यदि इसे ट्रस्ट में बदला जाता है तो प्रशासनिक और कानूनी ढांचे में बड़ा परिवर्तन होगा। जिला क्रिकेट संघों ने भी इस कदम का विरोध करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि बिना जनरल बॉडी की स्वीकृति के ऐसा कोई भी कदम संस्था की स्वायत्तता पर सवाल खड़ा करेगा।
पास वितरण और क्रिकेट गतिविधियों पर सवाल
विधानसभा में बहस के दौरान जूली ने यह भी आरोप लगाया कि मैचों के दौरान हजारों पास वितरित किए जाते हैं, लेकिन दो वर्षों से विधायकों का क्रिकेट मैच तक आयोजित नहीं किया जा सका। उन्होंने इसे खेल प्रशासन की विफलता बताते हुए कहा कि यदि राज्य में बुनियादी क्रिकेट गतिविधियां ही प्रभावित होंगी तो खिलाड़ियों का भविष्य कैसे सुरक्षित रहेगा। उनका कहना था कि सरकार को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचते हुए शीघ्र चुनाव कराने चाहिए, ताकि पारदर्शी और जवाबदेह नेतृत्व सामने आ सके।
आगे की संभावनाएं
पूरा विवाद अब राज्य की क्रिकेट राजनीति को नई दिशा दे सकता है। राजनीतिक दबाव और बढ़ती आलोचनाओं के बीच संभावना जताई जा रही है कि सरकार एडहॉक कमेटी में संशोधन कर सकती है और चुनाव प्रक्रिया को जल्द शुरू करने का निर्णय ले सकती है।
राजस्थान क्रिकेट के हितधारकों का मानना है कि संस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने और खिलाड़ियों के हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट और पारदर्शी कदम उठाना आवश्यक है। यदि स्थिति लंबे समय तक अनिश्चित बनी रहती है, तो इसका असर न केवल घरेलू क्रिकेट पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर राज्य की भागीदारी पर भी पड़ सकता है। फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले समय में सरकार का रुख और संभावित चुनावी घोषणा इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।


