शोभना शर्मा। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ पर देशभर में भव्य आयोजन हुए। राजस्थान में इस अवसर को एक ऐतिहासिक रूप दिया गया, जहां शिक्षा विभाग के नेतृत्व में एक साथ लाखों लोगों ने सामूहिक रूप से यह गीत गाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया। हालांकि इस आयोजन ने राज्य में एक बार फिर राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है।
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के निर्देश पर प्रदेश के सभी स्कूलों और शिक्षा विभाग के दफ्तरों में 7 नवंबर को सुबह 10:15 बजे “वंदे मातरम” का सामूहिक गायन कराया गया। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, करीब 1 करोड़ 25 लाख लोगों ने एक साथ यह गीत गाया। हालांकि, अभी भी सटीक गणना जारी है, जिससे यह संख्या और बढ़ सकती है। सरकार ने इसे देशभक्ति और एकता का प्रतीक बताया।
कांग्रेस ने बीजेपी पर लगाया ‘विरासत खत्म करने’ का आरोप
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस आयोजन का स्वागत तो किया, लेकिन साथ ही इसे राजनीति से प्रेरित बताया। गहलोत ने कहा कि इतने बड़े कार्यक्रम के लिए आम तौर पर विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों और समाज प्रतिनिधियों की समिति बनाई जाती है, परंतु यहां सब कुछ शिक्षा मंत्री के आदेश पर अचानक हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि “बीजेपी सरकार स्वतंत्रता आंदोलन की भावना और कांग्रेस की ऐतिहासिक विरासत को खत्म करने की कोशिश कर रही है।”
गहलोत ने कहा कि वंदे मातरम कांग्रेस की धरोहर है क्योंकि यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के हर आंदोलन में गाया गया। उन्होंने बताया कि 1937 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहली बार यह गीत गाया गया था और उसी वर्ष पंडित नेहरू, सरदार पटेल और सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं ने इसे राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता दी थी।
गहलोत ने कहा, “कांग्रेस ने हमेशा वंदे मातरम को सम्मान दिया, जबकि जिनकी शाखाओं में यह गीत कभी गाया ही नहीं गया, वे आज इसे अपनी राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह कांग्रेस की विरासत है, जिसे बीजेपी छीनना चाहती है।”
बीजेपी ने पलटवार किया, कहा– कांग्रेस ने ही किया था विरोध
गहलोत के आरोपों पर बीजेपी सांसद घनश्याम तिवाड़ी ने तीखा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अशोक गहलोत इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं। “वंदे मातरम” गीत देश के स्वतंत्रता सेनानियों में आजादी की चेतना जगाने वाला गीत था, लेकिन कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस गीत का विरोध किया था।
तिवाड़ी ने कहा कि “कांग्रेस ने वंदे मातरम को धर्म से जोड़ने की कोशिश की, जबकि यह मातृभूमि के प्रति समर्पण का गीत है।” उन्होंने बताया कि 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम की रचना की थी और 1882 में प्रकाशित उनके उपन्यास आनंदमठ में इसे स्थान मिला। 1905 के बंग-भंग आंदोलन के समय यह गीत स्वदेशी आंदोलन की आत्मा बन गया और स्वतंत्रता की लड़ाई का प्रेरक नारा बना।
तिवाड़ी ने कहा कि यह आयोजन किसी पार्टी का नहीं, बल्कि देश की संस्कृति और राष्ट्रभक्ति का उत्सव है। “जो लोग इस गीत को राजनीति से जोड़ रहे हैं, वे देश की भावना को नहीं समझते।”


