महिला आरक्षण के मुद्दे पर देश की राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है, जहां सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। हाल ही में लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को लेकर उत्पन्न स्थिति ने इस बहस को और तेज कर दिया है। सरकार जहां विपक्ष पर महिला आरक्षण का विरोध करने का आरोप लगा रही है, वहीं विपक्ष का कहना है कि वर्ष 2023 में इसी सरकार के कार्यकाल में महिला आरक्षण कानून पारित किया गया था, जिसे लागू करने में सरकार ने जानबूझकर देरी की है। इस टकराव के बीच महिला आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है।
कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया जा रहा है। महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा ने केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा है कि महिला आरक्षण को लेकर अब किसी बहस की जरूरत नहीं है, क्योंकि संसद पहले ही इसे पारित कर चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने करीब 30 महीने तक इस कानून का नोटिफिकेशन जारी नहीं किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार की प्राथमिकता में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देना शामिल नहीं है। उनके मुताबिक यदि सरकार वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी देना चाहती, तो इस कानून को समय रहते लागू किया जा सकता था।
विपक्ष का तर्क है कि वर्ष 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को तुरंत प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए था। उनका कहना है कि मौजूदा लोकसभा की 543 सीटों में ही एक तिहाई आरक्षण देकर महिलाओं को प्रतिनिधित्व दिया जा सकता था। विपक्षी नेताओं का मानना है कि यदि ऐसा किया गया होता, तो आज संसद में लगभग 180 महिला सांसद मौजूद होतीं, जो देश की नीति निर्माण प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रही होतीं। इस संदर्भ में विपक्ष सरकार पर देरी और राजनीतिक गणित के आधार पर फैसले लेने का आरोप लगा रहा है।
दूसरी ओर सरकार का पक्ष यह है कि महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया में परिसीमन यानी सीटों के पुनर्निर्धारण की आवश्यकता है। सरकार का तर्क है कि संसद की सीटों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है। हालांकि विपक्ष इस तर्क को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और इसे केवल टालमटोल की रणनीति करार दे रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि महिलाओं को उनका अधिकार देने के लिए किसी अतिरिक्त प्रक्रिया का इंतजार करना उचित नहीं है।
इस पूरे विवाद के बीच महिला कांग्रेस ने आगामी रणनीति भी स्पष्ट कर दी है। अलका लांबा ने कहा है कि संसद के आगामी मानसून सत्र में इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया जाएगा और केंद्र सरकार पर दबाव बनाया जाएगा कि वह महिला आरक्षण कानून को जल्द से जल्द लागू करे। इसके साथ ही संगठन स्तर पर भी अभियान चलाने की योजना बनाई गई है, जिसके तहत देशभर में हस्ताक्षर अभियान और पोस्टकार्ड अभियान चलाया जाएगा। इन अभियानों के जरिए आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित कर सरकार तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश की जाएगी कि महिलाएं अब अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हैं और किसी भी तरह की देरी को स्वीकार नहीं करेंगी।
अभियान के तहत जुटाए गए हस्ताक्षरों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को सौंपने की योजना है, ताकि महिला आरक्षण को लागू करने की मांग को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया जा सके। इसके अलावा पोस्टकार्ड अभियान के माध्यम से भी सरकार पर नैतिक दबाव बनाने की रणनीति तैयार की गई है। इसमें मुख्य रूप से दो मांगें शामिल हैं, जिनमें महिला आरक्षण कानून को तुरंत लागू करना और इसमें ओबीसी महिलाओं को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना शामिल है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय रहा है। इसे ‘आधी आबादी का हक’ माना जाता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में लगातार देरी होती रही है। ऐसे में यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता से भी जुड़ा हुआ है। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण महिलाओं को उनका उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।


