राजस्थान के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में शुमार राजस्थान यूनिवर्सिटी एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह गौरव नहीं बल्कि प्लेसमेंट की बेहद खराब स्थिति है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सामने आए आंकड़ों ने विश्वविद्यालय की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले पांच शैक्षणिक सत्रों के दौरान केवल 26 विद्यार्थियों को ही नौकरी मिल पाई है, जो अपने आप में चिंताजनक तस्वीर पेश करता है।
26 सितंबर 2025 को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आरटीआई के जवाब में जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020-21 में केवल 7 विद्यार्थियों का प्लेसमेंट हुआ, जबकि 2021-22 में एक भी छात्र को नौकरी नहीं मिल सकी। इसके बाद 2022-23 में 14 छात्रों को रोजगार मिला और 2023-24 में यह संख्या घटकर 5 रह गई। वहीं 2024-25 के आंकड़े विश्वविद्यालय के पास उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई है। इस तरह पांच वर्षों में कुल मिलाकर केवल 26 छात्रों का प्लेसमेंट होना विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई है कि इन 26 विद्यार्थियों को भी विश्वविद्यालय के प्लेसमेंट सेल के माध्यम से नौकरी नहीं मिली। विश्वविद्यालय प्रशासन ने खुद स्वीकार किया है कि प्लेसमेंट सेल किसी भी छात्र को सीधे तौर पर रोजगार दिलाने में सफल नहीं रहा। सभी विद्यार्थियों ने अपने स्तर पर प्रयास कर नौकरी हासिल की। इसका मतलब साफ है कि विश्वविद्यालय का प्लेसमेंट तंत्र लगभग निष्क्रिय बना हुआ है।
इस खुलासे के बाद छात्र समुदाय में असंतोष बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है और लोग विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। छात्रों का कहना है कि जब वे प्रदेश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में दाखिला लेते हैं, तो उनसे बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसरों की उम्मीद होती है, लेकिन मौजूदा हालात निराशाजनक हैं।
आरटीआई दाखिल करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता आशुतोष रांका ने इस स्थिति को बेहद गंभीर बताया है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय में करीब 26 से 27 हजार विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, ऐसे में प्लेसमेंट की यह स्थिति चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है और निजी क्षेत्र में काम करने के लिए जरूरी कौशल भी विद्यार्थियों को नहीं सिखाया जा रहा है। इस कारण बड़ी संख्या में छात्र डिग्री हासिल करने के बाद भी रोजगार से वंचित रह जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में केवल शैक्षणिक डिग्री पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्किल डेवलपमेंट भी उतना ही जरूरी है। लेकिन विश्वविद्यालय स्तर पर इस दिशा में ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। यही वजह है कि छात्र रोजगार बाजार की मांग के अनुसार खुद को तैयार नहीं कर पा रहे हैं। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह समस्या और गहरी हो सकती है।
छात्र संगठनों ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। एनएसयूआई से जुड़े डॉ. रामसिंह सामोता ने कहा कि यह आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं और यह दर्शाते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के भविष्य को लेकर गंभीर नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि नई शिक्षा नीति में स्पष्ट रूप से स्किल डेवलपमेंट और प्लेसमेंट पर जोर दिया गया है, इसके बावजूद विश्वविद्यालय इस दिशा में अपेक्षित काम नहीं कर रहा है। छात्रों से विभिन्न मदों में फीस ली जा रही है, लेकिन उसके बदले उन्हें उचित सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
वहीं एबीवीपी से जुड़े छात्र नेता अभिषेक मीणा ने भी विश्वविद्यालय प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि प्रदेश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में इस तरह की स्थिति होना बेहद चिंताजनक है। उन्होंने पूछा कि जब छात्र बड़ी उम्मीदों के साथ यहां प्रवेश लेते हैं, तो क्या उन्हें इस तरह के हालात का सामना करना चाहिए? उनका कहना है कि प्लेसमेंट की कमी से छात्रों के भविष्य पर सीधा असर पड़ता है और यह पूरे शैक्षणिक ढांचे की कमजोरी को उजागर करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, विश्वविद्यालयों में इंडस्ट्री के साथ बेहतर समन्वय, इंटर्नशिप के अवसर, और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना जरूरी है। इसके अलावा प्लेसमेंट सेल को सक्रिय और प्रभावी बनाना भी समय की मांग है। जब तक विश्वविद्यालय इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाएगा, तब तक छात्रों को रोजगार के लिए खुद ही संघर्ष करना पड़ेगा।
राजस्थान यूनिवर्सिटी जैसे बड़े संस्थान से उम्मीद की जाती है कि वह न केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे, बल्कि छात्रों को रोजगार के लिए भी तैयार करे। लेकिन मौजूदा आंकड़े यह संकेत देते हैं कि इस दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो यह स्थिति न केवल छात्रों बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।


