मनीषा शर्मा। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर की डिवीजन बेंच ने शिक्षक भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि किसी भी उम्मीदवार की पात्रता का निर्धारण केवल उस जानकारी के आधार पर किया जा सकता है जो उसने अपने आवेदन पत्र में दी हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि उम्मीदवार भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद नई या वैकल्पिक योग्यता का दावा नहीं कर सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति बिपिन गुप्ता की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए एकलपीठ के 23 फरवरी 2021 के आदेश को रद्द कर दिया और नरेशचंद्र पटेल की रिट याचिका खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
बांसवाड़ा जिले में टीचर ग्रेड-III (लेवल-I) भर्ती के लिए जारी विज्ञापन के तहत नरेशचंद्र पटेल ने आवेदन किया था। उन्होंने REET परीक्षा में 64.67 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे, जबकि सामान्य वर्ग के लिए कट-ऑफ 60 प्रतिशत था। इसके बावजूद उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई। प्रशासन ने उन्हें इस आधार पर अयोग्य घोषित किया कि सीनियर सेकेंडरी में उनके केवल 44.15 प्रतिशत अंक थे, जबकि न्यूनतम पात्रता के लिए 45 प्रतिशत आवश्यक थे। उन्होंने अपने आवेदन पत्र में पात्रता के रूप में सीनियर सेकेंडरी, REET परीक्षा और द्विवर्षीय डिप्लोमा का उल्लेख किया था।
पहली याचिका वापस, दूसरी में नया दावा
पटेल ने सबसे पहले एक याचिका दायर की, जिसमें यह दलील दी कि REET में उच्च अंक होने के बावजूद उन्हें सीनियर सेकेंडरी में कम अंक होने के कारण अयोग्य ठहराया गया, जो गलत है। यह याचिका लगभग ढाई साल तक चली, लेकिन 17 दिसंबर 2020 को उन्होंने इसे वापस लेते हुए नई याचिका दायर करने की अनुमति मांगी। वर्ष 2021 में उन्होंने नई याचिका दाखिल की और इस बार दावा किया कि उन्होंने आवेदन भरते समय गलती से अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री का उल्लेख नहीं किया। उनका कहना था कि विज्ञापन जारी होने से पहले ही उन्होंने ग्रेजुएशन पूरी कर ली थी, इसलिए पात्रता ग्रेजुएशन के आधार पर मानी जाए। साथ ही उन्होंने ओबीसी वर्ग का हवाला देते हुए 5 प्रतिशत की छूट की मांग भी की।
एकलपीठ ने दी थी राहत, सरकार ने की अपील
एकलपीठ ने 23 फरवरी 2021 को पटेल के पक्ष में फैसला दिया और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि उनकी पात्रता ग्रेजुएशन के आधार पर दोबारा जांची जाए। यदि वे योग्य पाए जाएं तो उन्हें नियुक्ति दी जाए। राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की। सरकारी वकील ने तर्क दिया कि पटेल ने अपने आवेदन पत्र में ग्रेजुएशन की जानकारी कभी नहीं दी थी, न ही पहली याचिका में इसका उल्लेख किया था। उन्होंने जो योग्यता दर्ज कराई, उसी के आधार पर उन्हें अयोग्य घोषित किया गया था। इसलिए बाद में नई योग्यता का दावा करना नियमों के विपरीत है। सरकार ने यह भी कहा कि भर्ती विज्ञापन के क्लॉज 9.2 और 12 में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि उम्मीदवार आवेदन शुल्क जमा करने से पहले अपनी पात्रता सुनिश्चित करे। पटेल ने आवेदन में न तो ग्रेजुएशन मार्कशीट जमा की और न ही इसका उल्लेख किया, इसलिए प्रशासन ने उन्हें सही तरीके से अयोग्य ठहराया।
डिवीजन बेंच का फैसला: “ढाई साल बाद दावा अस्वीकार्य”
खंडपीठ ने कहा कि पटेल की पहली याचिका में वैकल्पिक योग्यता (ग्रेजुएशन) का कोई उल्लेख नहीं था। उनका प्रारंभिक तर्क केवल सीनियर सेकेंडरी अंकों पर आधारित था। ढाई साल बाद आवेदन पत्र में न दी गई योग्यता को आधार बनाकर दावा करना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि भर्ती एजेंसी उम्मीदवार की पात्रता केवल आवेदन पत्र में भरी गई जानकारी के आधार पर ही तय कर सकती है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद कोई नया दस्तावेज या योग्यता पेश कर पात्रता नहीं बदली जा सकती। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी उम्मीदवार को ऐसी छूट दी गई तो यह समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ होगा और भर्ती की पारदर्शिता पर सवाल उठेंगे। इसलिए अदालत ने एकलपीठ का आदेश रद्द करते हुए राज्य सरकार की अपील को स्वीकार कर लिया।


