अगर आप अपने वाहन के लिए एनएचएआई (NHAI) फास्टैग का एनुअल पास बनवाने या रिन्यू कराने की योजना बना रहे हैं, तो सावधान हो जाइए। साइबर ठगों ने अब नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया की हूबहू नकल कर एक नया फिशिंग स्कैम शुरू कर दिया है। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए महानिदेशक पुलिस साइबर क्राइम संजय अग्रवाल ने आमजन के लिए एडवाइजरी जारी की है और लोगों को सतर्क रहने की अपील की है। पुलिस के अनुसार यह ठगी बेहद सुनियोजित तरीके से की जा रही है, जिसमें आम नागरिकों को गूगल सर्च के जरिए फंसाया जा रहा है।
गूगल सर्च के टॉप रिजल्ट में छुपा है ठगी का जाल
डीजीपी संजय अग्रवाल ने बताया कि साइबर अपराधी अब आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। वे गूगल विज्ञापन और सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (SEO) के माध्यम से अपनी फर्जी वेबसाइटों को सर्च रिजल्ट में सबसे ऊपर दिखा रहे हैं। आमतौर पर लोग गूगल पर दिखने वाले पहले लिंक को ही असली और भरोसेमंद मान लेते हैं। अपराधी अपनी वेबसाइट को Sponsored टैग के साथ ऊपर दिखाने के लिए भुगतान करते हैं। इन फर्जी वेबसाइटों का डिजाइन, लोगो और लेआउट बिल्कुल असली NHAI पोर्टल जैसा बनाया जाता है, जिससे आम व्यक्ति के लिए असली और नकली में फर्क करना बेहद मुश्किल हो जाता है।
3000 रुपए के भुगतान का झांसा
एडवाइजरी के मुताबिक ये फर्जी वेबसाइटें NHAI फास्टैग एनुअल पास के नाम पर करीब 3000 रुपए के भुगतान की मांग करती हैं। वेबसाइट पर एक क्यूआर कोड या भुगतान लिंक दिया जाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति इस क्यूआर कोड को स्कैन करता है या लिंक पर क्लिक कर भुगतान करता है, पैसा सरकारी खाते में जाने के बजाय साइबर अपराधियों के म्यूल अकाउंट में ट्रांसफर हो जाता है।
पुलिस ने स्पष्ट किया है कि सरकारी भुगतान कभी भी किसी व्यक्तिगत नाम पर नहीं मांगे जाते। यदि भुगतान के समय किसी व्यक्ति विशेष का नाम दिखाई दे, तो यह स्पष्ट संकेत है कि मामला संदिग्ध है।
कैसे पहचानें असली और नकली वेबसाइट
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी सरकारी सेवा के लिए भुगतान करते समय आधिकारिक प्लेटफॉर्म का ही उपयोग करना चाहिए। NHAI फास्टैग एनुअल पास खरीदने या रिन्यू कराने के लिए केवल Rajmarg Yatra के आधिकारिक ऐप या अधिकृत बैंक पोर्टल का ही इस्तेमाल करें।
वेबसाइट के URL को ध्यान से देखें। अक्सर फर्जी वेबसाइटों में डोमेन नाम में हल्का बदलाव किया जाता है, जैसे स्पेलिंग में अंतर या अतिरिक्त अक्षर जोड़ दिए जाते हैं। वेबसाइट पर HTTPS और सिक्योरिटी सर्टिफिकेट की जांच करना भी जरूरी है।
ऑनलाइन भुगतान करते समय बरतें सावधानी
ऑनलाइन भुगतान करते समय विशेष सतर्कता बरतना जरूरी है। किसी भी संदिग्ध लिंक के माध्यम से अपनी बैंकिंग जानकारी, ओटीपी या कार्ड डिटेल साझा न करें। यदि भुगतान स्क्रीन पर व्यक्तिगत नाम दिखाई दे या अकाउंट डिटेल संदिग्ध लगे, तो तुरंत प्रक्रिया रोक दें।
साथ ही, गूगल पर दिखने वाले Sponsored लिंक पर आंख बंद कर भरोसा न करें। कई बार असली वेबसाइट ऑर्गेनिक रिजल्ट में नीचे हो सकती है, जबकि फर्जी वेबसाइट विज्ञापन के जरिए ऊपर दिखाई देती है।
ठगी होने पर तुरंत क्या करें
यदि आप इस तरह के किसी फिशिंग स्कैम का शिकार हो जाते हैं, तो समय गंवाए बिना तुरंत कार्रवाई करें। साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर तुरंत कॉल करें। जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होगी, उतनी ही अधिक संभावना रहती है कि ट्रांजैक्शन को रोका या ट्रेस किया जा सके।
इसके अलावा राजस्थान पुलिस के विशेष हेल्पडेस्क नंबर 9256001930 और 9257510100 पर भी सूचना दी जा सकती है। आप अपनी शिकायत भारत सरकार के आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in पर भी ऑनलाइन दर्ज करा सकते हैं।
साइबर जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव
साइबर अपराध तेजी से बदलते तरीकों के साथ सामने आ रहे हैं। ऐसे में जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है। किसी भी सरकारी सेवा के लिए भुगतान करने से पहले आधिकारिक स्रोत की पुष्टि करें। गूगल सर्च के पहले लिंक को ही अंतिम सत्य न मानें। NHAI फास्टैग एनुअल पास स्कैम यह दिखाता है कि अपराधी लोगों की जल्दबाजी और भरोसे का फायदा उठाते हैं। इसलिए डिजिटल भुगतान करते समय हमेशा सतर्क रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना संबंधित अधिकारियों को दें।


