राजस्थान में किसानों की आय बढ़ाने और कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय बांस मिशन को एक बार फिर सक्रिय किया जा रहा है। उद्यान विभाग की ओर से इस योजना को पुनर्जीवित करते हुए इसे नए सिरे से लागू किया गया है, जिससे राज्य में बांस की खेती को बढ़ावा मिल सके और किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ वैकल्पिक आय के स्रोत उपलब्ध हो सकें। इस पहल की शुरुआत Pratapgarh जिले से की गई है, जहां चयनित किसानों को प्रशिक्षण और भ्रमण के माध्यम से बांस आधारित कृषि के बारे में जागरूक किया जा रहा है।
राष्ट्रीय बांस मिशन का उद्देश्य केवल बांस उत्पादन को बढ़ाना नहीं है, बल्कि इसे कृषि वानिकी के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में विकसित करना भी है। बांस एक ऐसी फसल है, जो कम लागत, कम देखभाल और लंबे समय तक आय देने की क्षमता के कारण किसानों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है। यही कारण है कि राज्य सरकार ने इसे फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है, ताकि किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सके।
गौरतलब है कि यह योजना पहले वर्ष 2007-08 से 2016-17 तक संचालित की गई थी, लेकिन बाद में विभिन्न कारणों से इसे बंद कर दिया गया था। अब बदलते समय और कृषि की नई जरूरतों को देखते हुए इसे फिर से लागू किया जा रहा है। इस बार योजना को अधिक व्यापक और तकनीकी रूप से मजबूत बनाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि इसका लाभ अधिक से अधिक किसानों तक पहुंच सके।
Pratapgarh जिले में इस योजना के तहत प्रथम चरण में पचास किसानों का चयन किया गया है। इन किसानों को बांस की खेती और उससे जुड़े उत्पादों के बारे में व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए विभिन्न जिलों में भ्रमण कराया गया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान किसानों को खेती की आधुनिक तकनीकों, फसल प्रबंधन और बाजार से जुड़ाव के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
किसानों को Chittorgarh, Rajsamand, Udaipur और Sirohi जैसे क्षेत्रों में स्थित बांस प्लांटेशन, वन विकास समितियों, वन नर्सरी और बांस विक्रय केंद्रों का भ्रमण कराया गया। इस दौरान उन्हें यह भी बताया गया कि किस प्रकार बांस की विभिन्न किस्मों का चयन किया जाए और उन्हें स्थानीय जलवायु के अनुसार कैसे उगाया जाए।
प्रशिक्षण के दौरान बांस से बनने वाले विभिन्न उत्पादों के बारे में भी जानकारी दी गई। इसमें फर्नीचर, कागज, हैंडीक्राफ्ट और अगरबत्ती जैसे उत्पाद शामिल हैं, जिनकी बाजार में काफी मांग है। इससे किसानों को यह समझने में मदद मिली कि बांस की खेती केवल कच्चा माल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए मूल्य संवर्धन कर अधिक लाभ कमाया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि पश्चिमी राजस्थान की शुष्क जलवायु के लिए उपयुक्त बांस की नई किस्मों पर काम किया जा रहा है। इससे उन क्षेत्रों के किसानों को भी इस खेती से जोड़ने की योजना है, जहां पानी की कमी एक बड़ी चुनौती है। यह पहल राज्य के कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव ला सकती है।
बांस की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बहुत अधिक देखभाल की जरूरत नहीं होती। एक बार रोपण के बाद यह चार से पांच साल में तैयार हो जाती है और लंबे समय तक नियमित आय देती रहती है। किसान इसे अपनी मुख्य फसल के साथ मेड़ों पर भी लगा सकते हैं, जिससे उनकी आय के स्रोत बढ़ जाते हैं। यही कारण है कि इसे कृषि वानिकी के लिए एक आदर्श विकल्प माना जा रहा है।
राजस्थान में इस योजना को कुल 12 जिलों में लागू किया जाएगा, जिनमें बांसवाड़ा, बाड़मेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, झालावाड़, करौली, प्रतापगढ़, सवाई माधोपुर, उदयपुर, डूंगरपुर, राजसमंद और सिरोही शामिल हैं। इन जिलों का चयन उनकी भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया गया है, ताकि बांस की खेती को अधिक प्रभावी तरीके से विकसित किया जा सके।
उद्यान विभाग के उप निदेशक Ramkishan Verma ने बताया कि इस योजना के तहत किसानों को न केवल खेती की तकनीक सिखाई जा रही है, बल्कि उन्हें बांस आधारित उत्पाद निर्माण के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकेगा और उनकी आय में वृद्धि होगी।


