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ग्रामीण रोजगार की नई परिभाषा: विकसित भारत–जी राम जी अधिनियम 2025 से बदलेगा गांवों का भविष्य

ग्रामीण रोजगार की नई परिभाषा: विकसित भारत–जी राम जी अधिनियम 2025 से बदलेगा गांवों का भविष्य

“भारत की आत्मा गांवों में वास करती है”—इस विचार को साकार रूप देने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। ग्रामीण बेरोजगारी, पलायन और अस्थिर आय की समस्या से निपटने के लिए विकसित भारत–जी राम जी (VB–G Ram Jee) अधिनियम, 2025 को लागू किया गया है। यह अधिनियम न केवल महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 का स्थान लेता है, बल्कि ग्रामीण रोजगार को एक आधुनिक, टिकाऊ और विकासोन्मुख ढांचे में परिवर्तित करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्राथमिकता रही है कि ग्रामीण युवाओं को अपने गांव में ही सम्मानजनक रोजगार मिले और गांव आत्मनिर्भर बनें। यह अधिनियम उसी सोच का विस्तारित और उन्नत स्वरूप माना जा रहा है।

100 से 125 दिन: रोजगार की वैधानिक गारंटी में ऐतिहासिक वृद्धि

इस अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता है ग्रामीण परिवारों के लिए गारंटीकृत रोजगार को 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन करना। धारा 5(1) के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम करने को इच्छुक हैं, को प्रति वित्तीय वर्ष न्यूनतम 125 दिन का मजदूरी रोजगार प्रदान करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। यह वृद्धि ग्रामीण परिवारों की आय को अधिक स्थिर बनाती है, काम की पूर्वानुमेयता बढ़ाती है और आजीविका सुरक्षा को मजबूत करती है।

खेती और मजदूरी के बीच संतुलन: 60 दिनों का नो-वर्क पीरियड

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि की केंद्रीय भूमिका को ध्यान में रखते हुए अधिनियम में एक नया और संतुलित प्रावधान किया गया है। धारा 6 के तहत राज्यों को खेती के व्यस्त मौसम (बुवाई और कटाई) के दौरान एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 60 दिनों की समेकित विराम अवधि अधिसूचित करने का अधिकार होगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस विराम अवधि से श्रमिकों के 125 दिनों के रोजगार अधिकार में कोई कटौती नहीं होगी, बल्कि शेष अवधि में रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। इससे कृषि उत्पादकता और श्रमिक हितों के बीच संतुलन सुनिश्चित किया गया है।

मजदूरी नहीं, टिकाऊ परिसंपत्तियों से जुड़ा रोजगार

विकसित भारत–जी राम जी अधिनियम केवल मजदूरी भुगतान तक सीमित नहीं है। धारा 4(2) के तहत रोजगार को चार प्राथमिक विषयगत क्षेत्रों में टिकाऊ सार्वजनिक परिसंपत्तियों के सृजन से जोड़ा गया है, जिनमें—

  • जल संरक्षण और जल संसाधन प्रबंधन

  • ग्रामीण आजीविका और संपत्ति निर्माण

  • बुनियादी ग्रामीण अवसंरचना

  • पर्यावरणीय और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण

इससे गांवों में केवल अस्थायी रोजगार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकास का आधार तैयार होगा।

समय पर मजदूरी भुगतान की कानूनी गारंटी

ग्रामीण योजनाओं की सबसे बड़ी चुनौती रही है मजदूरी भुगतान में देरी। इस अधिनियम में इसे सख्ती से संबोधित किया गया है। धारा 5(3) के अनुसार—

  • मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर, या

  • किसी भी स्थिति में कार्य समाप्ति के 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा

यदि भुगतान में देरी होती है तो अनुसूची-द्वितीय के प्रावधानों के तहत मुआवजा देना अनिवार्य होगा। इससे श्रमिकों की आय सुरक्षा और भरोसा दोनों मजबूत होंगे।

तकनीक से पारदर्शिता और जवाबदेही

भ्रष्टाचार और फर्जी कार्यों पर अंकुश लगाने के लिए अधिनियम में आधुनिक तकनीक के उपयोग पर विशेष जोर दिया गया है। इसमें—

  • जीपीएस आधारित कार्य निगरानी

  • एमआईएस डैशबोर्ड

  • एआई आधारित विश्लेषण और निगरानी प्रणाली

शामिल हैं। इससे योजना की निगरानी रियल-टाइम में संभव होगी और जवाबदेही बढ़ेगी।

ग्राम पंचायत स्तर पर विकेंद्रीकृत योजना

यह अधिनियम विकेंद्रीकरण को केंद्र में रखता है। ग्राम पंचायत स्तर पर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार योजनाओं का निर्माण किया जाएगा। इससे—

  • स्थानीय समस्याओं का स्थानीय समाधान

  • संसाधनों का बेहतर उपयोग

  • ग्राम स्तर पर भागीदारी और स्वामित्व की भावना

को बढ़ावा मिलेगा।

केंद्र–राज्य व्यय साझेदारी और प्रशासनिक मजबूती

यह एक केंद्रीय प्रायोजित योजना है, जिसे राज्यों द्वारा अधिसूचित कर लागू किया जाएगा।
व्यय साझेदारी का स्वरूप इस प्रकार होगा—

  • सामान्य राज्य: 60:40

  • पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्य: 90:10

  • विधानसभारहित केंद्र शासित प्रदेश: 100% केंद्र वित्तपोषण

इसके साथ ही प्रशासनिक व्यय की अधिकतम सीमा को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत किया गया है, जिससे मानव संसाधन, प्रशिक्षण और तकनीकी क्षमता को सुदृढ़ किया जा सके।

विकसित भारत 2047 की दिशा में निर्णायक कदम

विकसित भारत–जी राम जी अधिनियम 2025 ग्रामीण रोजगार को केवल एक कल्याणकारी योजना से आगे बढ़ाकर एकीकृत विकास मॉडल में बदलता है। यह सशक्तिकरण, समावेशन, कन्वर्जेंस और सेचुरेशन के सिद्धांतों पर आधारित है। ग्रामीण आय सुरक्षा, टिकाऊ अवसंरचना, आधुनिक शासन और तकनीकी निगरानी के माध्यम से यह अधिनियम समृद्ध, सक्षम और आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की नींव को और मजबूत करता है—जो विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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