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अरावली संरक्षण पर नई बहस: पदयात्रा, सुप्रीम कोर्ट और सरकार पर आरोप

अरावली संरक्षण पर नई बहस: पदयात्रा, सुप्रीम कोर्ट और सरकार पर आरोप

मनीषा शर्मा। अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर चल रही बहस और संघर्ष एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। राजस्थान यूनिवर्सिटी के निवर्तमान अध्यक्ष और NSUI नेता निर्मल चौधरी ने अरावली बचाने के लिए 1000 किलोमीटर लंबी पदयात्रा शुरू की है। इस पदयात्रा के दौरान उन्होंने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अरावली की परिभाषा बदलने की कोशिश पर्यावरण के साथ बड़ा खिलवाड़ है। उनके अनुसार यह केवल कानूनी या नीति संबंधी विवाद नहीं, बल्कि प्राकृतिक विरासत और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।

निर्मल चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला सिर्फ एक न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि प्रकृति, संविधान और जनहित के पक्ष में सच्चाई की जीत है। उन्होंने कहा कि अरावली को लेकर सरकार की नीतियां लगातार संदेह के घेरे में रही हैं और यह लड़ाई केवल पर्यावरण कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के हर जिम्मेदार नागरिक की लड़ाई है।

सरकार पर तीखे आरोप: “अकेली पड़ गई है सरकार”

निर्मल चौधरी का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा लाई गई नई परिभाषा का विरोध केवल जन आंदोलनों तक सीमित नहीं रहा। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया, सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी और अदालत के अमीकस क्यूरी तक ने इस कदम पर सवाल उठाए। उनके अनुसार इससे स्पष्ट हो गया कि सरकार इस मुद्दे पर न केवल नैतिक रूप से कमजोर पड़ी, बल्कि संस्थागत रूप से भी अकेली पड़ती नजर आई।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अरावली को फिलहाल राहत जरूर मिली है, लेकिन यह राहत स्थायी नहीं मानी जा सकती। संघर्ष अभी बाकी है, क्योंकि बार-बार ऐसी नीतियां सामने आती रही हैं जिनसे खनन, रियल एस्टेट और कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा मिलता दिखता है। इसीलिए, वे मानते हैं कि अरावली बचाने का आंदोलन अब और अधिक संगठित तथा दृढ़ होना चाहिए।

“अरावली हमारी सांसों की ढाल”

निर्मल चौधरी ने अरावली के महत्व को बेहद संवेदनशील शब्दों में समझाया। उनके अनुसार यह पर्वतमाला सिर्फ पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि हमारी सांसों की ढाल है। यह भूजल recharge, जल-स्रोतों की सुरक्षा, जैव विविधता और जलवायु संतुलन की मजबूत कड़ी है। अगर अरावली कमजोर होती है, तो उसका सीधा असर हवा की गुणवत्ता, तापमान, वर्षा और खेती-किसानी तक दिखाई देगा। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केंद्रीय पर्यावरण मंत्री द्वारा दिए गए कई तर्कों को खारिज करता है। इसलिए, नैतिक जिम्मेदारी के तहत मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए। चौधरी के अनुसार पर्यावरण जैसे संवेदनशील विषय पर कोई भी समझौता देश के भविष्य से समझौता होगा।

पदयात्रा का संदेश: विरोध से आगे बढ़कर संवाद

निर्मल चौधरी बताते हैं कि उनकी 1000 किलोमीटर लंबी पदयात्रा केवल विरोध दर्ज कराने का माध्यम नहीं है। इसका उद्देश्य समाज और सरकार दोनों को यह याद दिलाना है कि प्राकृतिक विरासत को बचाना सामूहिक जिम्मेदारी है। रास्ते में विभिन्न गांवों और शहरों में लोगों से संवाद कर वे यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अरावली केवल राजस्थान या हरियाणा की नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा ढाल है।

वे कहते हैं कि जब पहाड़, जंगल और जल-स्रोत सुरक्षित रहते हैं, तभी विकास स्थायी बनता है। इसलिए विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। उनके अनुसार नीतियां ऐसी होनी चाहिए जो आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरण को भी प्राथमिकता दें।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: उम्मीद, लेकिन चुनौती भी

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों ने अरावली क्षेत्र में अनियंत्रित खनन और निर्माण गतिविधियों पर रोक को मजबूती दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय संतुलन किसी भी अल्पकालिक आर्थिक लाभ से अधिक महत्वपूर्ण है। इस फैसले ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय समुदायों को नई उम्मीद दी है।

हालांकि, निर्मल चौधरी मानते हैं कि केवल न्यायिक आदेश काफी नहीं होते। उनका कहना है कि अगर प्रशासनिक इच्छाशक्ति, राजनीतिक प्रतिबद्धता और जनभागीदारी नहीं जुड़ती, तो नीतियां कागजों से आगे नहीं बढ़ पातीं। इसलिए आवश्यक है कि नागरिक, संगठन और सरकार — तीनों मिलकर अरावली संरक्षण के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाएं।

सामूहिक जिम्मेदारी की ओर संकेत

पदयात्रा के दौरान चौधरी बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि प्रकृति के साथ समझौता अंततः मानव जीवन को ही प्रभावित करता है। इसलिए इस मुद्दे को किसी पार्टी या विचारधारा तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि अरावली को संरक्षित रखना आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरणीय सुरक्षा कवच तैयार करना है।

वे यह भी कहते हैं कि समाधान तभी निकलेगा, जब स्थानीय लोग, नीति-निर्माता, वैज्ञानिक और न्यायिक संस्थाएं एक साझा दृष्टि लेकर आगे बढ़ें। अरावली जैसी पर्वतमालाएं सिर्फ भौगोलिक संरचनाएं नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर हैं, जिन्हें संरक्षित रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।

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