मनीषा शर्मा। देश का नाम इंडिया से बदलकर आधिकारिक रूप से ‘भारत’ करने को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। जयपुर ग्रामीण से बीजेपी के सांसद राव राजेंद्र ने संसद में प्राइवेट मेंबर बिल के माध्यम से यह प्रस्ताव पेश किया है। उनका तर्क है कि ‘भारत’ नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि इस राष्ट्र की सांस्कृतिक, सभ्यतागत और ऐतिहासिक पहचान का मूल तत्व है। उपनिवेश काल में अंग्रेजों ने ‘इंडिया’ नाम देकर भारतीय पहचान को कमजोर करने का प्रयास किया, इसलिए स्वतंत्र भारत को अपनी ऐतिहासिक मूल पहचान को अपनाना चाहिए।
“हम जिस भूमि में रहते हैं, वह मां भारती है, उसका वास्तविक नाम भारत है”
सांसद राव राजेंद्र ने बिल पेश करते हुए कहा कि जिस भूमि पर हम रहते हैं, जिसे हम मां भारती कहते हैं, उसका नाम सदियों से भारत ही रहा है। अंग्रेजो ने उपनिवेश बनाने के बाद इसे ‘इंडिया’ नाम दिया, जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता से मेल नहीं खाता। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 1 का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें लिखा है — “India, that is Bharat”। यह दर्शाता है कि संविधान ने भारत को प्राथमिक पहचान के रूप में स्वीकारा है और इंडिया शब्द अंग्रेजी अनुवाद मात्र है।
उन्होंने कहा कि जब संविधान का विमोचन हुआ, तो उसे ‘भारत’ नाम से ही अलंकृत किया गया। भारत शब्द को हिंदी साहित्य, पुराणों, इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं में सदियों से स्वीकारा गया है। इसलिए राष्ट्र के आधिकारिक नाम के रूप में ‘भारत’ शब्द ही उपयुक्त रहेगा।
“संस्कृति और सभ्यता के स्वरूप में भारत शब्द ही उचित”
सांसद राव ने अपने भाषण में तर्क दिया कि संविधान की व्याख्या, अनुवाद और दस्तावेजों में यदि कोई भ्रम उत्पन्न होता है, तो वह अंग्रेजी शब्द इंडिया से जुड़ा है। जब संसद, न्यायपालिका और प्रशासनिक दस्तावेजों में अंग्रेजी अनुवाद ज्यादा महत्व पाता है, तो राष्ट्र का नाम भी उसी रूप में स्थापित होता है। उन्होंने कहा कि भारत जैसा सांस्कृतिक और सभ्यतागत नाम अंग्रेजी शब्द इंडिया की तुलना में अधिक व्यापक, प्रामाणिक और ऐतिहासिक है।
उनका कहना था कि भारतीय संस्कृति, भारतीय न्याय प्रावधान और भारतीय संविधान में जहां भी मूल पहचान की चर्चा होगी, वहां भारत शब्द ही उचित प्रतीत होता है। हमारी सभ्यता हमें प्रेरित करती है कि हम अपने राष्ट्र का अलंकरण उसके मूल नाम ‘भारत’ से ही करें।
“जब शहरों के नाम बदले तो देश का नाम क्यों नहीं?”
राव राजेंद्र ने तर्क दिया कि भारत में कई शहरों के नाम ऐतिहासिक एवं स्थानीय पहचान के अनुरूप बदले गए। बंबई को मुंबई, मद्रास को चेन्नई, कलकत्ता को कोलकाता और गुड़गांव को गुरुग्राम नाम दिया गया। इन बदलावों का उद्देश्य सांस्कृतिक शुद्धता और ऐतिहासिक पहचान को पुनर्स्थापित करना था। उन्होंने कहा कि यदि शहरों के नाम बदलकर उनकी मूल पहचान लौटाई जा सकती है, तो देश का नाम इंडिया से ‘भारत’ क्यों नहीं किया जा सकता?
उन्होंने यह भी कहा कि भारत की न्याय व्यवस्था को भी भारतीय न्याय संहिता का नाम देकर सांस्कृतिक पहचान को महत्व दिया गया। इसलिए देश के नाम में भी यही दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
जर्मनी का उदाहरण देते हुए कहा – अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ‘भारत’ नाम को मान्यता मिली
सांसद राव ने अपने भाषण में जर्मनी का उदाहरण देते हुए कहा कि 1800 के दशक में भी कई अंतरराष्ट्रीय विद्वान और इतिहासकार भारत को ‘भारत’ नाम से संबोधित करते थे। उन्होंने उल्लेख किया कि उस समय भारत स्वतंत्र नहीं था, लेकिन दुनिया के कई देशों ने इसकी सांस्कृतिक शक्ति और सभ्यतागत पहचान को ‘भारत’ नाम से पहचाना।
उनका कहना था कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत को अपने आधिकारिक नाम को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं रखना चाहिए। संविधान में मान्यता मिलने के बाद राष्ट्र को एक नाम — भारत — से ही जाना जाना चाहिए।


