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जैसलमेर में मोहन भागवत: बंटे हुए समाज पर भागवत की चिंता

जैसलमेर में मोहन भागवत: बंटे हुए समाज पर भागवत की चिंता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने समाज में बढ़ते विभाजन और आपसी भेदभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि जब समाज बंट जाता है और अपने मूल एकत्व को भूल जाता है, तब बाहरी आक्रमण और संकट बढ़ जाते हैं। उन्होंने कहा कि हम वास्तव में एक ही हैं, भले ही पंथ और संप्रदाय अलग-अलग क्यों न हों। संस्कृति, देश और समाज के आधार पर हम सभी एक हैं।

मोहन भागवत ने यह बात शुक्रवार को जैसलमेर में आयोजित जैन समाज के चादर महोत्सव के दौरान कही। उन्होंने समाज से भेदभाव और स्वार्थ को त्यागकर सद्भावना के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया।

सोनार दुर्ग में दर्शन के बाद कार्यक्रम में पहुंचे

जैसलमेर प्रवास के दौरान मोहन भागवत सबसे पहले सोनार दुर्ग पहुंचे, जहां उन्होंने ई-रिक्शा से दुर्ग तक यात्रा की। यहां उन्होंने पार्श्वनाथ जैन मंदिर में दर्शन-पूजन किया। इसके बाद जिनभद्र सूरी ज्ञान भंडार और दादा गुरुदेव की पावन चादर के दर्शन भी किए।

इसके बाद वे देदांसर मेला ग्राउंड में आयोजित तीन दिवसीय चादर महोत्सव के मुख्य कार्यक्रम में शामिल हुए और सभा को संबोधित किया। इस अवसर पर देशभर से बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु और साधु-संत मौजूद रहे।

समाज में एकता का दिया संदेश

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि समाज में होने वाले अधिकांश झगड़े इसलिए होते हैं क्योंकि लोग अपने मूल एकत्व को पहचान नहीं पाते। उन्होंने कहा कि यदि लोग यह समझ लें कि सभी एक ही मूल से जुड़े हैं, तो समाज में अधिकांश विवाद समाप्त हो सकते हैं।

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि ट्रेन में सीट को लेकर दो लोगों के बीच झगड़ा हुआ, लेकिन बातचीत के दौरान पता चला कि वे दोनों भाई हैं, जो बचपन में बिछड़ गए थे। इसके बाद दोनों गले मिलकर रोने लगे। भागवत ने कहा कि यह उदाहरण बताता है कि जब लोग अपने संबंधों और एकत्व को पहचानते हैं, तब सभी विवाद समाप्त हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि लोग एक-दूसरे को अपना मानते हैं तो आधी रोटी भी बांटकर खा लेते हैं, लेकिन जब अपनापन नहीं होता तो व्यक्ति केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचता है।

व्यवस्था और अहंकार में फर्क समझना जरूरी

मोहन भागवत ने कहा कि समाज में कई बार व्यवस्था के कारण लोगों की बैठने या काम करने की जगह अलग-अलग होती है। जैसे किसी सभा में वक्ता को ऊपर बैठाया जाता है ताकि वह सभी को दिखाई दे सके, जबकि श्रोता नीचे बैठते हैं।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति इस व्यवस्था को अपनी श्रेष्ठता समझने लगे तो यह गलत सोच है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल कार्य व्यवस्था है और इससे किसी की ऊंच-नीच तय नहीं होती। सभी लोग समान हैं और सभी का मूल एक ही है।

जन्म से मनुष्य, जाति बाद में

भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा में सभी पंथ और संप्रदाय एक ही मूल विचार से शुरू होते हैं कि एक से अनेक उत्पन्न हुए हैं। अलग-अलग दर्शन और परंपराएं हो सकती हैं, लेकिन उनका उद्देश्य एक ही है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्म से केवल मनुष्य होता है और जाति जैसी पहचान बाद में जुड़ती है। कई बार बच्चों को अपनी जाति का पता भी नहीं होता और उन्हें यह जानकारी स्कूल के फॉर्म भरते समय मिलती है। इसलिए समाज को जाति और संप्रदाय के भेद से ऊपर उठकर एकता की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

सद्भावना से ही सुलझेंगे विवाद

मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया में चल रही कई समस्याओं का समाधान भारत की परंपराओं में मौजूद है। उन्होंने कहा कि विवादों को केवल तर्क या समझौते से नहीं, बल्कि सद्भावना से सुलझाया जा सकता है।

उन्होंने समाज के लोगों से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में सद्भावना का व्यवहार अपनाएं और अपने आसपास के लोगों को परिवार की तरह मानें। यदि समाज का हर व्यक्ति अपने दायरे में लोगों के साथ आत्मीयता से व्यवहार करे तो समाज में आपसी कलह समाप्त हो सकती है।

उन्होंने कहा कि आज का समय चुनौतीपूर्ण है और ऐसे समय में समाज को एकजुट होकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

जैन संत ने भी दिया एकता का संदेश

कार्यक्रम में जैन संत जिनमणिप्रभ सूरीश्वरजी महाराज ने भी समाज में एकता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जैन समाज को हिंदुओं से अलग समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार भारत में रहने वाले लोगों की पहचान भारतीय संस्कृति से जुड़ी है और जैन धर्म भगवान महावीर की शिक्षाओं को आगे बढ़ाने का मार्ग है।

उन्होंने कहा कि धर्म और संस्कृति का उद्देश्य समाज में सद्भावना और नैतिक मूल्यों को मजबूत करना है।

स्मारक सिक्का और डाक टिकट का लोकार्पण

चादर महोत्सव के दौरान मोहन भागवत ने दादा गुरुदेव की स्मृति में जारी किए गए स्मारक सिक्के और विशेष डाक टिकट का लोकार्पण भी किया। इसके साथ ही ‘दादा गुरुदेव’ नामक पुस्तक का भी विमोचन किया गया।

इस महोत्सव की विशेषता यह है कि करीब 871 वर्षों बाद दादा गुरुदेव की पावन चादर का विधिवत अभिषेक और दर्शन कराए जा रहे हैं। इस ऐतिहासिक अवसर को देखने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु जैसलमेर पहुंचे हैं।

कार्यक्रम में संत-महात्माओं, समाज के प्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इसे एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक आयोजन बना दिया।

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