राजस्थान में नगर निकाय सीमा से गुजरने वाले राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर स्थित करीब 1102 शराब दुकानों को फिलहाल बंद नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें इन दुकानों को हटाने और अन्यत्र स्थानांतरित करने के निर्देश दिए गए थे। इस फैसले से राज्य सरकार के साथ-साथ शराब व्यवसाय से जुड़े लाइसेंस धारकों को भी बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उस समय आया है, जब राज्य में आबकारी नीति और राजस्व को लेकर गंभीर बहस चल रही थी। इन दुकानों के बंद होने से राज्य को करीब 2100 करोड़ रुपये के संभावित राजस्व नुकसान का अनुमान लगाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ और सुनवाई का विवरण
यह अंतरिम आदेश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने पारित किया। पीठ ने राज्य सरकार और अन्य लाइसेंस धारकों द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवमंगल शर्मा ने अदालत के समक्ष दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपने पूर्व के कई निर्णयों में नगर निकाय सीमा के भीतर 500 मीटर की बाध्यता से राहत दे चुका है। ऐसे में हाईकोर्ट द्वारा सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधि की अनदेखी करना विधिसंगत नहीं है।
500 मीटर नियम पर सुप्रीम कोर्ट की पुरानी व्याख्या
राज्य सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि नगर निगम, नगर परिषद या अन्य शहरी निकायों की सीमा के भीतर स्थित हाईवे पर 500 मीटर के दायरे का नियम यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। सरकार का कहना था कि शहरी क्षेत्रों में हाईवे व्यावहारिक रूप से शहर की मुख्य सड़कों के समान हो जाते हैं, जहां व्यापारिक गतिविधियां स्वाभाविक रूप से संचालित होती हैं। ऐसे में ग्रामीण या गैर-आबादी वाले क्षेत्रों के लिए बनाए गए सुरक्षा मानकों को शहरी इलाकों पर उसी कठोरता से लागू करना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट का 24 नवंबर 2025 का आदेश
इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट की मुख्यपीठ, जोधपुर ने 24 नवंबर 2025 को एक अहम आदेश पारित किया था। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से 500 मीटर की परिधि में स्थित सभी शराब दुकानों की पहचान करे और उन्हें हटाकर अन्यत्र स्थानांतरित करे। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि यह आदेश नगर निगम सीमा, स्थानीय स्वशासी निकायों या वैधानिक विकास प्राधिकरणों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों पर भी समान रूप से लागू होगा। अदालत का मानना था कि नगर सीमाओं का विस्तार सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सड़क सुरक्षा मानकों को कमजोर करने का आधार नहीं बन सकता।
सार्वजनिक सुरक्षा बनाम राजस्व का मुद्दा
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दुर्घटना संबंधी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों की जान और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है। अदालत के अनुसार, यदि हाईवे के पास शराब की दुकानों के कारण सड़क दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ती है, तो उसे रोका जाना चाहिए, भले ही इससे राज्य सरकार को राजस्व का नुकसान क्यों न हो। हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि लगभग 2100 करोड़ रुपये के संभावित राजस्व नुकसान जैसी वित्तीय चिंताएं, सार्वजनिक सुरक्षा के अधिकार पर भारी नहीं पड़ सकतीं। इसी आधार पर अदालत ने राज्य को निश्चित समय-सीमा में सभी ऐसी दुकानों को बंद या स्थानांतरित करने के निर्देश दिए थे।
2100 करोड़ के नुकसान की आशंका
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि यदि हाईकोर्ट के आदेश को तत्काल लागू किया जाता, तो राज्य के आबकारी राजस्व पर गहरा असर पड़ता। करीब 1102 शराब दुकानों के बंद होने से लगभग 2100 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया गया था, जो राज्य के बजट और विकास योजनाओं को प्रभावित कर सकता था। सरकार का यह भी कहना था कि आबकारी राजस्व से सामाजिक कल्याण, बुनियादी ढांचा और अन्य जनहित योजनाएं चलाई जाती हैं। ऐसे में अचानक इतने बड़े पैमाने पर दुकानों को बंद करना व्यावहारिक और वित्तीय दोनों ही दृष्टि से कठिन है।
आगे क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई अंतरिम रोक के बाद फिलहाल ये सभी शराब दुकानें यथावत संचालित होती रहेंगी। हालांकि, यह रोक अस्थायी है और मामले की अंतिम सुनवाई के बाद ही यह तय होगा कि हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा या उसमें संशोधन किया जाएगा।


