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साइबर सेफ्टी सेमिनार में जस्टिस पुष्पेन्द्र भाटी बोले, संकट में आमजन की आवाज उठाए न्यायपालिका

साइबर सेफ्टी सेमिनार में जस्टिस पुष्पेन्द्र भाटी बोले, संकट में आमजन की आवाज उठाए न्यायपालिका

साइबर सेफ्टी सेमिनार के समापन सत्र में पुष्पेन्द्र भाटी ने कहा कि आमजन न्यायपालिका से यह अपेक्षा करता है कि जब उसका जीवन खतरे में हो, आर्थिक नुकसान हो रहा हो या उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो रही हो, तब न्यायपालिका और लीगल सिस्टम उसकी आवाज को मजबूती से उठाए। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को संकटमोचक की भूमिका निभाते हुए नागरिकों की रक्षा करनी चाहिए।

जस्टिस भाटी ने न्यायिक अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा से भी जुड़ा हुआ है। साइबर अपराधों के बढ़ते मामलों के बीच न्यायिक तंत्र की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ गई है।

राजस्थान की भौगोलिक चुनौतियां और न्यायिक दायित्व

जस्टिस भाटी ने सभागार में मौजूद न्यायिक अधिकारियों से कहा कि वे उस राजस्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो क्षेत्रफल के लिहाज से 126 देशों से बड़ा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में न्यायिक अधिकारी कई बार न्याय देने के लिए एक हजार किलोमीटर तक की यात्रा करते हैं।

उन्होंने दिल्ली में ट्रांसफर को लेकर एक प्रसंग साझा करते हुए कहा कि वहां न्याय क्षेत्र में स्थानांतरण का मतलब दस से तीस किलोमीटर की दूरी हो सकती है, लेकिन राजस्थान में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने के लिए सैकड़ों और कभी-कभी हजारों किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इसके बावजूद प्रदेश के न्यायिक अधिकारी पूरी प्रतिबद्धता के साथ आमजन को न्याय प्रदान कर रहे हैं।

आउट ऑफ द बॉक्स सोच की आवश्यकता

समापन सत्र को संबोधित करते हुए एसपी शर्मा ने कहा कि आज के दौर में आंखों से दिखाई देने वाली हर चीज को सत्य मान लेना उचित नहीं है। डीपफेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में न्यायाधीशों को पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर विचार करना होगा।

उन्होंने कहा कि प्रदेश में कॉन्स्टेबल स्तर के पुलिसकर्मियों को साइबर सिक्योरिटी की ट्रेनिंग दी जा रही है, लेकिन अब समय आ गया है कि पुलिस के उच्चाधिकारियों को भी इस तरह का विशेष प्रशिक्षण दिया जाए। साइबर अपराधों की केवल संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि त्वरित जांच, तकनीकी दक्षता और न्यायिक प्रशिक्षण ही प्रभावी समाधान दे सकते हैं।

उन्होंने न्यायिक अकादमियों से विशेष साइबर अपराध प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू करने का आग्रह किया, ताकि न्यायिक अधिकारी नई तकनीकों और अपराध के बदलते स्वरूप को बेहतर ढंग से समझ सकें।

टेक्नोलॉजी को रोका नहीं जा सकता: अर्जुनराम मेघवाल

समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि किसी भी टेक्नोलॉजी को रोका नहीं जा सकता। टेक्नोलॉजी सुविधा के साथ-साथ आशंकाएं भी लेकर आती है।

उन्होंने कहा कि जब देश में कंप्यूटर आया था, तब भी उसका विरोध हुआ था। लेकिन समय के साथ समाज ने उसे स्वीकार किया और आज वह जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। वर्तमान में इंडस्ट्री 4.0 का दौर चल रहा है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, थ्री-डी प्रिंटिंग, ब्लॉकचेन और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी तकनीकों का विस्तार हो रहा है।

मेघवाल ने कहा कि साइबर अपराध भी इन्हीं तकनीकों के विस्तार का परिणाम है, लेकिन इससे डरने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि 21वीं सदी एशिया की होगी और भारत इसका नेतृत्व करेगा। ऐसे में साइबर अपराध की चुनौतियों का समाधान भी भारत ही खोजेगा।

न्यायिक और तकनीकी समन्वय की जरूरत

सेमिनार के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में न्यायपालिका, पुलिस और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच समन्वय आवश्यक है। तेजी से बदलती तकनीक के बीच कानून और न्याय प्रणाली को भी समान गति से विकसित होना होगा।

साइबर अपराध अब सीमाओं से परे जाकर वैश्विक स्वरूप ले चुके हैं। ऐसे में न्यायिक अधिकारियों के लिए तकनीकी समझ और अद्यतन प्रशिक्षण अनिवार्य हो गया है। इस सेमिनार का उद्देश्य भी इसी दिशा में जागरूकता और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना था।

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