राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर बड़ा विवाद सामने आया है, जिसमें बहुचर्चित आदर्श क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी घोटाले को लेकर सत्ता और न्यायिक प्रक्रिया दोनों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने इस मामले में प्रदेश की भजनलाल शर्मा सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। जूली ने विशेष रूप से राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) की भूमिका पर सवाल उठाते हुए इसे ‘हितों के टकराव’ का मामला बताया है।
इस घोटाले का संबंध आदर्श क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी से है, जिसे वर्ष 1999 में मुकेश मोदी और उनके परिवार द्वारा शुरू किया गया था। आरोप है कि इस सोसाइटी ने वर्ष 2010 से 2014 के बीच देशभर के करीब 22 लाख निवेशकों से लगभग 15 हजार करोड़ रुपये की ठगी की। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस धन को करीब 125 फर्जी कंपनियों के माध्यम से इधर-उधर किया गया और अंततः यह रकम आरोपी परिवार और उनके करीबियों तक पहुंचाई गई।
टीकाराम जूली ने आरोप लगाया कि इस गंभीर आर्थिक अपराध के बावजूद न्याय की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और राज्य सरकार खुद इसमें पारदर्शिता बरतने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि एक ही वकील का दो अलग-अलग पक्षों में शामिल होना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि यह न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
जूली के अनुसार, इस मामले में एक आरोपी सिद्धार्थ चौहान भी शामिल है, जो अन्य मामलों में फरार घोषित किया जा चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस लॉ फर्म के माध्यम से आरोपी की पैरवी की जा रही है, वही फर्म राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की पैरवी भी कर रही है। इस फर्म का नाम ‘ऑरा एंड कंपनी’ बताया गया है, जिससे जुड़े अधिवक्ता शिवमंगल शर्मा सहित अन्य वकील इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं।
इस संदर्भ में टीकाराम जूली ने सवाल उठाया कि आखिर यह कैसे संभव है कि एक ही वकील एक ओर आरोपी का बचाव कर रहा हो और दूसरी ओर पीड़ितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहा हो। उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘हितों के टकराव’ का मामला बताते हुए कहा कि इससे लाखों निवेशकों के साथ अन्याय हो रहा है, जिन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई इस सोसाइटी में लगाई थी।
जूली ने इस मुद्दे को कानूनी दृष्टिकोण से भी उठाया और कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम स्पष्ट रूप से किसी भी वकील को विरोधी हितों वाले पक्षों के लिए कार्य करने से रोकते हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि वकील और क्लाइंट का संबंध विश्वास पर आधारित होता है। यदि एक वकील दोनों पक्षों की गोपनीय जानकारी रखता है, तो न्याय की निष्पक्षता प्रभावित होती है।
इस पूरे मामले में उन्होंने राज्य सरकार से कई अहम सवाल पूछे हैं। उन्होंने पूछा कि क्या संबंधित वकील या उनकी फर्म ने सरकार को यह जानकारी दी थी कि वे इसी घोटाले के एक आरोपी की ओर से भी पैरवी कर रहे हैं। यदि सरकार को इस बात की जानकारी थी, तो ऐसे वकील को राज्य का प्रतिनिधित्व सौंपना गंभीर लापरवाही है। वहीं यदि यह जानकारी छिपाई गई, तो यह प्रोफेशनल मिसकंडक्ट का मामला बनता है, जिस पर कार्रवाई होनी चाहिए।
टीकाराम जूलीने इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि वह पीड़ितों के साथ खड़ी है या नहीं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मामले में पारदर्शिता नहीं बरती गई, तो यह लाखों निवेशकों के साथ धोखा होगा, जो पहले ही आर्थिक रूप से भारी नुकसान झेल चुके हैं।
इस विवाद ने राजस्थान की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसमें न केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शामिल हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता भी सवालों के घेरे में आ गई है। विपक्ष जहां इस मुद्दे को लेकर सरकार पर दबाव बना रहा है, वहीं सरकार की ओर से अब तक इस मामले में कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।


