जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) का आज पांचवां और अंतिम दिन रहा। साहित्य, विचार और संवाद के इस सबसे बड़े मंच ने समापन के दिन भी श्रोताओं को गहन विमर्श और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से जोड़े रखा। दिन की शुरुआत मॉर्निंग म्यूजिक से हुई, जिसमें नवाब खान और द मंत्रा बैंड ने अपनी सजीव प्रस्तुति से समां बांध दिया। संगीत के साथ शुरू हुए दिन ने यह संकेत दे दिया कि जेएलएफ का आखिरी दिन भी विचारों और भावनाओं से भरपूर रहने वाला है।
JLF 2027 की तारीखों का ऐलान
जेएलएफ के प्रोड्यूसर संजोय रॉय ने मंच से अगले वर्ष के जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की तारीखों की औपचारिक घोषणा की। उन्होंने बताया कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2027 का आयोजन 14 जनवरी से 18 जनवरी तक होटल क्लार्क्स आमेर में किया जाएगा। इस घोषणा के साथ ही साहित्य प्रेमियों के बीच अगले वर्ष के आयोजन को लेकर उत्साह देखने को मिला।
‘Gen-Z, मिलेनियल्स और मम्मीजी’ सेशन में समाज पर मंथन
चारबाग में आयोजित ‘Gen-Z, मिलेनियल्स और मम्मीजी’ सत्र में भारतीय समाज में हो रहे पीढ़ीगत बदलावों, सोच और व्यवहार पर विस्तार से चर्चा की गई। इस सत्र में संतोष देसाई, अनुराग माइनस वर्मा और रिया चोपड़ा ने चिराग ठक्कर के साथ संवाद किया। संतोष देसाई ने कहा कि भारत आज दुनिया की उभरती महाशक्तियों में से एक है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा विरोधाभास भी जुड़ा है। उनके अनुसार भारतीय समाज प्रगति चाहता है, लेकिन परिवर्तन का विरोध करता है। उन्होंने कहा कि समाज विकास की बातें सुनना चाहता है, लेकिन मूलभूत बदलावों से असहज महसूस करता है। यही आज भारत का केंद्रीय मुद्दा बन चुका है।
Gen Z कोई एक जैसी श्रेणी नहीं
अनुराग माइनस वर्मा ने जनरेशन Z को लेकर प्रचलित धारणाओं पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि Gen Z को एक समान श्रेणी में बांधना बेहद मुश्किल है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली का कोई Gen Z टेलर स्विफ्ट के कॉन्सर्ट में जाने को लेकर उत्साहित हो सकता है, वहीं राजस्थान का Gen Z सपना चौधरी के कॉन्सर्ट में जाने के लिए बेताब हो सकता है। उन्होंने आगे कहा कि मुंबई का कोई Gen Z जोहरान ममदानी का प्रशंसक हो सकता है, जबकि राजस्थान का कोई Gen Z अशोक गहलोत का। ऐसे में समान आकांक्षाओं को एक मंच पर लाना और किसी एक बड़ी राष्ट्रीय क्रांति की कल्पना करना व्यवहारिक नहीं है। हर राज्य का अपना वर्गीय और जातिगत दृष्टिकोण है, जो Gen Z की सोच और आंदोलन को अलग दिशा देता है।
Gen Z को बताया ‘कल्चरल मजदूर’
अनुराग ने Gen Z को ‘कल्चरल मजदूर’ की संज्ञा देते हुए कहा कि यह पीढ़ी जो देखती है, वही अपनाने की कोशिश करती है। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी ब्रांड फोकस्ड हो गई है और उनकी पहचान उपभोक्तावादी बनती जा रही है। इसका परिणाम यह है कि वे वास्तविक जीवन से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आज एल्गोरिदम तय कर रहा है कि लोग क्या देखें और क्या सोचें। कई इन्फ्लुएंसर पहले लेफ्ट विंग कंटेंट बनाते थे, लेकिन जब वहां से ट्रैफिक नहीं मिला तो उन्होंने राइट विंग कंटेंट बनाना शुरू कर दिया, क्योंकि वहां उन्हें फायदा दिखा।
‘परमाक्राइसिस’ में जी रही है मिलेनियल पीढ़ी
रिया चोपड़ा ने कहा कि मिलेनियल्स एक स्थायी संकट की स्थिति में जी रहे हैं, जिसे उन्होंने ‘परमाक्राइसिस’ कहा। उनके अनुसार दुनिया एक के बाद एक संकट थोप रही है, चाहे वह स्वास्थ्य प्रणाली की विफलता हो, राजनीतिक अव्यवस्था हो या जलवायु परिवर्तन। उन्होंने कहा कि जब युवाओं को यह एहसास होता है कि मौजूदा व्यवस्थाएं उनके लिए काम नहीं कर रही हैं, तब वे खुद कुछ करने के लिए एकजुट होते हैं। यही जनरेशन Z की क्रांतियों को गति देता है। यह आंदोलन किसी एक विचारधारा से नहीं, बल्कि साझा असंतोष से पैदा हो रहा है।
फिल्मों और ओटीटी से बनती है पुलिस की छवि
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आयोजित ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ सत्र में राजस्थान के डीजीपी राजीव शर्मा ने हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि बहुत कम लोगों का पुलिस से सीधा संपर्क होता है, जबकि अधिकांश लोग फिल्मों, किताबों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाने वाली कहानियों के आधार पर पुलिस को लेकर राय बना लेते हैं। डीजीपी ने कहा कि मीडिया, लेखक और रचनाकारों की यह बड़ी जिम्मेदारी है कि पुलिस को लेकर समाज के सामने संतुलित और तथ्यपरक नैरेटिव प्रस्तुत किया जाए। उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस व्यवस्था में कमियां हैं और गलतियां भी होती हैं, जिन्हें उजागर किया जाना जरूरी है, लेकिन अच्छे कार्यों को भी समान रूप से सामने लाया जाना चाहिए।
बदल रही है पुलिस की कार्यशैली
राजीव शर्मा ने कहा कि तकनीक, प्रशिक्षण और कार्यशैली में बदलाव के साथ पुलिस भी समय के अनुरूप खुद को बेहतर बना रही है। उन्होंने फिल्मों का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले अधिकतर फिल्मों में पुलिस को तब दिखाया जाता था, जब सब कुछ हो चुका होता था, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। उन्होंने लेखकों और पत्रकारों से अपील की कि वे सच लिखते रहें और सकारात्मक लेखन के माध्यम से समाज को प्रेरित करें, क्योंकि इससे पुलिस व्यवस्था को भी बेहतर बनने की प्रेरणा मिलती है।
विभाजन की कथाओं पर भावुक चर्चा
बागान में आयोजित ‘विभाजन की कथाएं’ सत्र में लेखिका भावना सोमाया, किश्वर देसाई और ताबिना अंजूम ने हिस्सा लिया। किश्वर देसाई ने अपने माता-पिता के विभाजन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनके पिता 90 वर्ष की उम्र में भी अनारकली बाजार की यादों में खो जाते थे। इसी स्मृति ने उन्हें पार्टीशन म्यूजियम बनाने की प्रेरणा दी। भावना सोमाया ने कहा कि उनके लिए कराची कोई पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक ऐसा भाई है जिसे उन्होंने कभी देखा नहीं। उन्होंने बताया कि विभाजन की यादें उनके परिवार का स्थायी हिस्सा रही हैं और लेखन के जरिए उन्होंने उन भावनाओं को स्वर दिया।
विचारों के संग हुआ JLF का समापन
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का अंतिम दिन साहित्य, समाज, राजनीति और संस्कृति के विविध पहलुओं को समेटते हुए संपन्न हुआ। Gen Z से लेकर विभाजन की स्मृतियों और पुलिस की सामाजिक छवि तक, जेएलएफ ने एक बार फिर यह साबित किया कि यह सिर्फ एक साहित्यिक उत्सव नहीं, बल्कि विचारों का जीवंत मंच है, जहां भारत के वर्तमान और भविष्य पर खुलकर संवाद होता है।


