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जल जीवन मिशन घोटाला: पूर्व IAS सुबोध अग्रवाल से 10 घंटे पूछताछ

जल जीवन मिशन घोटाला: पूर्व IAS सुबोध अग्रवाल से 10 घंटे पूछताछ

राजस्थान में चर्चित जल जीवन मिशन घोटाले की जांच लगातार तेज होती जा रही है और इसी कड़ी में पूर्व आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल से एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने करीब 10 घंटे तक लगातार पूछताछ की। दिल्ली से गिरफ्तार किए गए अग्रवाल से इस दौरान फर्जी सर्टिफिकेट, टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं और पूर्व मंत्री महेश जोशी से संबंधों को लेकर कई अहम सवाल किए गए, लेकिन सूत्रों के अनुसार उन्होंने ज्यादातर सवालों पर संतोषजनक जवाब नहीं दिया।

एसीबी सूत्रों का कहना है कि पूछताछ के दौरान करीब 125 सवाल पूछे गए, जिनमें से अधिकांश पर अग्रवाल ने या तो चुप्पी साध ली या खुद को मामले से पूरी तरह अलग बताया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस पूरे घोटाले में उनकी कोई भूमिका नहीं है। हालांकि पूछताछ के दौरान उनका भावनात्मक पक्ष भी सामने आया और उनकी आंखें नम हो गईं, जिससे यह मामला और अधिक संवेदनशील बन गया है।

पूछताछ के दौरान सबसे ज्यादा ध्यान पूर्व मंत्री महेश जोशी के साथ उनके संबंधों पर केंद्रित रहा। एसीबी अधिकारियों ने तीन बार यह सवाल दोहराया कि उनका जोशी से क्या संबंध था, लेकिन हर बार अग्रवाल ने इस सवाल का जवाब देने से बचते हुए चुप्पी बनाए रखी। इस चुप्पी को जांच एजेंसी काफी महत्वपूर्ण मान रही है और इसे केस की एक अहम कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

जांच में यह भी सामने आया है कि श्रीगणपति ट्यूबवेल और श्रीश्याम ट्यूबवेल नामक फर्मों ने इरकॉन का फर्जी सर्टिफिकेट लगाकर सरकारी काम हासिल किए। इस मुद्दे पर जब अग्रवाल से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने इस मामले की जांच विशाल सक्सेना से करवाई थी। हालांकि एसीबी इस जवाब से संतुष्ट नहीं है और इस पूरे मामले में उनकी भूमिका को लेकर और गहराई से जांच कर रही है।

टेंडर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर भी अग्रवाल से कई सवाल किए गए। उन पर आरोप है कि उन्होंने टेंडर की शर्तों में हेरफेर कर करीब 50 करोड़ रुपए तक के प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी। हालांकि उन्होंने इन आरोपों को भी सिरे से खारिज कर दिया और खुद को निर्दोष बताया।

इस पूरे मामले में कई इंजीनियरों और अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ चुकी है। एसीबी की जांच में यह संकेत मिले हैं कि यह घोटाला और भी बड़ा हो सकता था और इसकी राशि 20 हजार करोड़ रुपए तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। यही वजह है कि एजेंसी अब हर पहलू की बारीकी से जांच कर रही है और जुड़े हुए सभी लोगों की भूमिका खंगाल रही है।

गौरतलब है कि एसीबी ने इस मामले की जांच वर्ष 2024 में शुरू की थी और अब तक 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें कई वरिष्ठ इंजीनियर और अधिकारी शामिल हैं। इससे पहले 17 फरवरी को मुख्य अभियंता दिनेश गोयल, केडी गुप्ता, शुभांशु दीक्षित, सुशील शर्मा, निरिल कुमार, विशाल सक्सेना, अरुण श्रीवास्तव, डीके गौड, महेंद्र प्रकाश सोनी और केरल के मुकेश पाठक को गिरफ्तार किया गया था।

जांच एजेंसी के अनुसार इस घोटाले में टेंडर प्रक्रिया के दौरान बड़े स्तर पर अनियमितताएं बरती गईं। आरोप है कि मैसर्स गणपति ट्यूबवेल और मैसर्स श्याम ट्यूबवेल के मालिकों ने संबंधित अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर सरकारी प्रोजेक्ट्स हासिल किए। इस दौरान रिश्वत लेने के भी आरोप सामने आए हैं, जिसमें बताया गया कि फर्म मालिकों ने अधिकारियों को जयपुर के एक होटल में बुलाकर लेन-देन किया।

एसीबी अब इस मामले में फरार चल रहे आरोपियों पर भी शिकंजा कसने की तैयारी में है। तीन आरोपी—संजीव गुप्ता, जितेंद्र शर्मा और मुकेश गोयल—अभी तक गिरफ्त से बाहर हैं और उनके खिलाफ स्टैंडिंग वारंट जारी किए जा चुके हैं। एजेंसी उनकी संपत्तियों को अटैच करने की भी तैयारी कर रही है ताकि जांच को आगे बढ़ाया जा सके और आर्थिक नुकसान की भरपाई सुनिश्चित की जा सके।

इस पूरे घटनाक्रम ने राजस्थान में प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकारी परियोजनाओं की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जल जीवन मिशन जैसी महत्वाकांक्षी योजना, जिसका उद्देश्य हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना है, उसमें इस तरह के आरोप सामने आना न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह व्यवस्था की खामियों को भी उजागर करता है।

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