जयपुर के भक्तों के लिए इस वर्ष की महाशिवरात्रि फिर एक अपूर्ण भावना के साथ बीतेगी क्योंकि एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर, जो साल में केवल एक ही दिन श्रद्धालुओं के लिए खुलता था, इस बार भी जनता के दर्शन हेतु नहीं खुलेगा। कोरोना काल में बंद किए गए इस रहस्यमयी मंदिर के पट अब लगातार छह वर्षों से बंद हैं, और महाशिवरात्रि आने से पहले ही एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया गया है कि मंदिर इस वर्ष भी श्रद्धालुओं के लिए सुलभ नहीं होगा।
जयपुर की पहचान का हिस्सा बना यह मंदिर शहर की स्थापना से भी पुराना माना जाता है। शहर के धार्मिक और ऐतिहासिक ढांचे में इसकी गहरी उपस्थिति है, परंतु वर्तमान में यह पहाड़ी मंदिर केवल दूर से ही दिखाई देता है, जहां भक्त पहुंचने तक की अनुमति भी नहीं पा रहे। पूरा इलाका इन दिनों इस चर्चा से भरा हुआ है कि आखिर इस बार भी मंदिर क्यों नहीं खोला जा रहा।
साल में केवल एक बार खुलने की परंपरा और छह साल से टूटता आ रहा क्रम
जयपुर में एक पुरानी कहावत प्रचलित है—“पहाड़ के ऊपर शिव, नीचे गणेश और सामने लक्ष्मी नारायण।” यहां शिव से तात्पर्य इसी एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर से है, जबकि नीचे स्थित स्थलों में मोती डूंगरी गणेश मंदिर और सामने भव्य बिड़ला मंदिर का उल्लेख किया जाता है।
यह आध्यात्मिक त्रिकोण सदियों से जयपुर की धार्मिक पहचान का आधार रहा है। परंतु पिछले छह वर्षों से यह श्रृंखला अधूरी है क्योंकि एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर महाशिवरात्रि पर भी नहीं खुल रहा, जबकि पहले इसी दिन हजारों भक्त पहाड़ी पर चढ़कर शिवलिंग के दर्शन करते थे। मंदिर प्रशासन और सुरक्षा कारणों के चलते इस वर्ष भी द्वार बंद रखने का निर्णय लिया गया, जिससे भक्तों में मायूसी है। स्थानीय लोग इसे परंपरा के टूटने और धार्मिक विरासत की उपेक्षा के रूप में देखते हैं।
अदृश्य मूर्तियों का रहस्य और सदियों पुरानी कहानियां
एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर की पहचान केवल उसकी प्राचीनता से ही नहीं, बल्कि उसकी रहस्यमयी कहानियों से भी जुड़ी है। सबसे अधिक चर्चित कथा मंदिर में स्थापित ‘अदृश्य मूर्तियों’ की है, जिसे लेकर आज भी रहस्य कायम है।
बुजुर्गों के अनुसार, राजाओं के काल में यहां भगवान शिव के साथ पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियां स्थापित की गई थीं। परंतु स्थापना के बाद समय बीतते-बीतते ये मूर्तियां रहस्यमयी तरीके से गायब हो गईं। यह घटना इतनी चौंकाने वाली थी कि दोबारा प्राण-प्रतिष्ठा कर मूर्तियां स्थापित की गईं, लेकिन दूसरी बार भी वही परिणाम सामने आया—मूर्तियां फिर अदृश्य हो गईं। इन घटनाओं ने इस मंदिर को और अधिक रहस्यमयी बना दिया और स्थानीय मान्यता के अनुसार यह स्थल दिव्य शक्तियों का धाम माना जाने लगा। आज भी इन मूर्तियों के गायब होने के पीछे कोई प्रमाणिक तथ्य नहीं मिल पाया है।
शंकरगढ़ किला और राजाओं की श्रद्धा
इस मंदिर से जुड़ा एक और प्रमुख पहलू पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक शंकरगढ़ किला है, जिसकी नींव सवाई जय सिंह द्वितीय ने रखी थी। जयपुर के इतिहास में इस किले का विशेष स्थान है क्योंकि कहा जाता है कि किसी भी बड़े अभियान या युद्ध पर निकलने से पहले राजपरिवार यहां आकर महादेव का आशीर्वाद लेता था।
सावन मास में यहां भव्य सहस्त्रघट रुद्राभिषेक का आयोजन होता था, जिसमें हजारों लीटर जल से अभिषेक किया जाता था। पहाड़ी तक पहुंचने का मार्ग कभी श्रद्धालुओं से भरा रहता था, लेकिन अब यह रास्ता बंद और सूना पड़ा है। भक्तों का कहना है कि प्रशासन को कम से कम महाशिवरात्रि पर तो परंपरा को पुनर्जीवित करना चाहिए।
भक्तों की भावनाएं और भविष्य की उम्मीद
मंदिर का बंद रहना केवल एक धार्मिक स्थल की अनुपलब्धता नहीं है, बल्कि जयपुर की उस सांस्कृतिक विरासत का ठहर जाना भी है, जिसे पीढ़ियों ने संजोया है। श्रद्धालु, स्थानीय निवासी और इतिहासप्रेमी हर वर्ष इस उम्मीद में रहते हैं कि शायद इस बार मंदिर के द्वार खुलेंगे, परंतु यह प्रतीक्षा लगातार लंबी होती जा रही है।
फिर भी श्रद्धालु उम्मीद लगाए बैठे हैं कि आने वाले वर्षों में मंदिर प्रशासन व्यवस्था और सुरक्षा के उपायों पर काम कर इस दुर्लभ परंपरा को पुनः जीवित करेगा और जयपुर के इस अद्भुत आध्यात्मिक स्थल को फिर से जनसाधारण के लिए खोला जाएगा।


