ईरान से जुड़े युद्ध और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के आर्थिक प्रभाव अब धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं। इस बीच विश्व बैंक के प्रमुख अजय बंगा ने एक गंभीर चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यह संघर्ष केवल तत्कालिक संकट नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी आर्थिक प्रभाव लंबे समय तक दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भले ही जल्द ही युद्धविराम हो जाए, लेकिन उसके बाद भी आर्थिक अस्थिरता और मंदी का दबाव खत्म नहीं होगा।
अजय बंगा के अनुसार, यदि ईरान से जुड़े इस संघर्ष में तत्काल और स्थायी युद्धविराम भी स्थापित हो जाता है, तब भी वैश्विक आर्थिक विकास दर में गिरावट आना तय है। उन्होंने अनुमान जताया कि ऐसी स्थिति में वैश्विक वृद्धि दर में लगभग 0.3 से 0.4 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। वहीं यदि यह युद्धविराम टूटता है या संघर्ष लंबा खिंचता है, तो यह गिरावट और भी अधिक गंभीर हो सकती है और करीब 1 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक ढांचे पर इस युद्ध का प्रभाव कितना व्यापक और गहरा हो सकता है।
इस संकट का असर केवल विकास दर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा बाजार और वित्तीय प्रणालियों पर भी पड़ने वाला है। तेल और गैस की आपूर्ति में अस्थिरता के कारण ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा। विशेष रूप से वे देश जो ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भर हैं, उनके लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बन सकती है।
महंगाई के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक नजर आ रही है। अजय बंगा ने संकेत दिया कि अगर युद्धविराम कायम रहता है, तब भी वैश्विक महंगाई दर में 0.2 से 0.3 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी संभव है। लेकिन यदि संघर्ष जारी रहता है या और तेज होता है, तो महंगाई 0.9 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। यह वृद्धि आम उपभोक्ताओं के लिए महंगी जीवनशैली और बढ़ते खर्चों के रूप में सामने आएगी। खासतौर पर विकासशील देशों में इसका असर अधिक गहरा होगा, जहां पहले से ही आर्थिक संसाधन सीमित हैं।
सबसे गंभीर स्थिति में, कुछ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई दर 6.7 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। यह स्थिति सामाजिक और आर्थिक असंतुलन को बढ़ा सकती है, जिससे गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं और अधिक गहराने का खतरा है। इसीलिए विश्व बैंक ने पहले ही उन देशों के साथ संवाद शुरू कर दिया है, जो इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।
विश्व बैंक ने ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों, विशेष रूप से छोटे द्वीपीय राष्ट्रों के लिए आपातकालीन सहायता की तैयारी शुरू कर दी है। इसके तहत ‘क्राइसिस रिस्पॉन्स विंडो’ जैसे विशेष फंडिंग तंत्र के जरिए इन देशों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि वे ऊर्जा संकट और बढ़ती महंगाई से निपट सकें। यह कदम इस बात को दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस संकट को गंभीरता से ले रही हैं और संभावित नुकसान को कम करने के प्रयास कर रही हैं।
अजय बंगा ने इस दौरान सरकारों को एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि देशों को ऐसी ऊर्जा सब्सिडी योजनाओं में नहीं उलझना चाहिए, जो लंबे समय तक टिकाऊ न हों। अल्पकालिक राहत देने वाली ये योजनाएं भविष्य में वित्तीय अस्थिरता को जन्म दे सकती हैं और सरकारी खजाने पर भारी बोझ डाल सकती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस संकट से सीख लेते हुए देशों को अपनी ऊर्जा नीतियों में दीर्घकालिक सुधार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिन देशों ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता नहीं लाई है, वे इस तरह के वैश्विक संकटों में सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। ऐसे देशों को भविष्य में आर्थिक रूप से कमजोर बने रहने का जोखिम रहता है। इसलिए ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और विविधता लाना अब एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है।
इस संदर्भ में अजय बंगा ने नाइजीरिया का उदाहरण दिया, जहां एक बड़ी रिफाइनरी परियोजना के जरिए देश ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है। इस परियोजना ने न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा किया है, बल्कि पड़ोसी देशों को जेट ईंधन जैसे उत्पादों का निर्यात करने की क्षमता भी विकसित की है। यह उदाहरण इस बात को रेखांकित करता है कि सही निवेश और रणनीति के जरिए ऊर्जा क्षेत्र में स्थिरता लाई जा सकती है।
अंततः, उन्होंने यह सुझाव दिया कि दुनिया को अब पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करते हुए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ना होगा। परमाणु ऊर्जा, जल विद्युत, भू-तापीय ऊर्जा के साथ-साथ पवन और सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों को अपनाना समय की मांग है। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में आर्थिक और पर्यावरणीय संकट और अधिक गंभीर हो सकते हैं।


