अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण पहल उस समय विफल हो गई जब ईरान-अमेरिका के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित शांति वार्ता किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी। इस विफलता की जानकारी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दी, जिसके बाद भारत सहित विभिन्न देशों में इस घटनाक्रम को लेकर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है।
भारत में इस मामले पर धार्मिक और सामाजिक संगठनों की भी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। राजस्थान के अजमेर से ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल (एआईएससी) के अध्यक्ष सैयद नसीरुद्दीन ने इस वार्ता की विफलता को लेकर पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जब शांति प्रक्रिया का नेतृत्व कमजोर हाथों में होता है, तो ऐसे परिणाम सामने आना स्वाभाविक है।
सैयद नसीरुद्दीन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तान जैसे देश को शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका देना ही एक बड़ी गलती थी। उनके अनुसार, पाकिस्तान का अतीत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादों और आरोपों से भरा रहा है, विशेष रूप से आतंकवाद को लेकर उसकी भूमिका पर कई बार सवाल उठ चुके हैं। ऐसे में उसे शांति का दूत बनाना प्रक्रिया की गंभीरता को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय ही वार्ता के विफल होने का एक प्रमुख कारण बन गया।
उन्होंने अमेरिका की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस पूरी प्रक्रिया से यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका किस तरह के सहयोगियों को चुन रहा है। सैयद नसीरुद्दीन के अनुसार, अमेरिका की नीयत शुरू से ही संदिग्ध रही है और वह ऐसे देशों के साथ मिलकर शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जिनकी विश्वसनीयता पर पहले से ही प्रश्नचिह्न लगे हुए हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस वार्ता में भारत को मध्यस्थ के रूप में शामिल किया जाता, तो परिणाम अलग हो सकते थे। उनके अनुसार, भारत एक मजबूत और संतुलित देश है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय छवि सकारात्मक है और जो निष्पक्ष तरीके से बातचीत को आगे बढ़ाने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि भारत की मौजूदगी में वार्ता अधिक गंभीरता और मजबूती के साथ होती और किसी न किसी समझौते की संभावना भी बन सकती थी।
सैयद नसीरुद्दीन ने पाकिस्तान के नेताओं के रवैये पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वार्ता के दौरान पाकिस्तान के प्रतिनिधियों का व्यवहार ऐसा था, मानो उन्होंने किसी बड़े नेता को आमंत्रित किया हो और वे खुद को एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हों। उनके अनुसार, इस तरह का रवैया शांति वार्ता की गंभीरता के अनुरूप नहीं था और इससे प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
उन्होंने यह भी कहा कि इस वार्ता से दुनिया को काफी उम्मीदें थीं, क्योंकि वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ता जा रहा है। सैयद नसीरुद्दीन के अनुसार, आज पूरी दुनिया किसी न किसी रूप में संघर्ष और अस्थिरता की चपेट में है, और ऐसे में शांति वार्ताएं ही एकमात्र रास्ता हैं जो स्थिरता ला सकती हैं। हालांकि इस वार्ता के विफल होने से यह उम्मीद टूट गई है और आगे की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य का जिक्र करते हुए कहा कि मौजूदा समय में वैश्विक राजनीति जटिल होती जा रही है और कई देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संघर्षों में उलझे हुए हैं। ऐसे में यदि प्रमुख शक्तियां मिलकर समाधान नहीं निकालती हैं, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस वार्ता की विफलता केवल दो देशों के बीच संवाद का टूटना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक कूटनीति के लिए भी एक संकेत है कि मौजूदा रणनीतियों में बदलाव की आवश्यकता है। मध्यस्थ देशों की भूमिका, उनकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता जैसे मुद्दे अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।


