मनीषा शर्मा। राजस्थान सरकार ने एक ऐतिहासिक प्रशासनिक फैसला लेते हुए राज्य के तीन बड़े शहरों — जयपुर, जोधपुर और कोटा — के नगर निगमों का एकीकरण कर दिया है। इस फैसले के बाद अब तीनों शहरों में अलग-अलग निगमों की जगह एकीकृत नगर निगम व्यवस्था लागू होगी। सरकार के इस निर्णय से महापौरों और पार्षदों के सभी अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं और अब संभागीय आयुक्त प्रशासक के रूप में निगमों का कामकाज संभालेंगे।
पूनम ने जयपुर में संभाली कमान
राजधानी जयपुर में संभागीय आयुक्त पूनम ने सोमवार को नगर निगम प्रशासन की कमान संभाल ली। यह पहली बार है जब जयपुर में हेरिटेज और ग्रेटर निगम के विलय के बाद एकीकृत प्रशासनिक ढांचा प्रभावी हुआ है।
मीडिया से बातचीत में पूनम ने कहा कि, “नई व्यवस्था को एडजस्ट होने में थोड़ा समय लगेगा, लेकिन यह बदलाव जयपुर नगर निगम के कामकाज को अधिक सुचारु और पारदर्शी बनाएगा। नागरिकों की सुविधा के लिए सभी प्रक्रियाओं को एक प्लेटफॉर्म पर लाने की कोशिश की जा रही है।”
उन्होंने कहा कि निगमों के एकीकरण के बाद आने वाले शुरुआती दिनों में तकनीकी बदलावों के कारण कुछ सेवाओं में अस्थायी दिक्कतें हो सकती हैं, लेकिन नागरिकों की असुविधा को न्यूनतम रखने की पूरी कोशिश की जा रही है।
डिजिटल सेवाओं का विलय और नई व्यवस्था की शुरुआत
पूनम ने बताया कि इस समय नगर निगमों की वेबसाइट और ऑनलाइन नागरिक सेवाओं को एकीकृत करने का कार्य चल रहा है। पहले जयपुर में दो अलग-अलग निगम — हेरिटेज और ग्रेटर — की वेबसाइट्स कार्यरत थीं। अब दोनों को एक प्लेटफॉर्म पर मर्ज किया जा रहा है ताकि जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, भवन अनुमति, संपत्ति कर भुगतान, और शिकायत निवारण जैसी सेवाएं एक ही पोर्टल से की जा सकें।
उन्होंने बताया कि “तकनीकी टीमें इस काम में लगी हैं और उम्मीद है कि जल्द ही सभी सेवाएं सामान्य हो जाएंगी। नागरिकों को किसी तरह की परेशानी नहीं होगी। पहले की तरह सभी विभागों का कामकाज जारी रहेगा।”
सरकार का निर्णय: प्रशासनिक दक्षता और पारदर्शिता की दिशा में कदम
राज्य सरकार ने यह एकीकरण भजनलाल शर्मा सरकार के प्रशासनिक सुधारों के तहत किया है। जयपुर, जोधपुर और कोटा में पहले दो-दो नगर निगम कार्यरत थे — एक उत्तर या हेरिटेज और दूसरा दक्षिण या ग्रेटर निगम। इससे प्रशासनिक समन्वय की कमी, निर्णय प्रक्रिया में देरी और वित्तीय वितरण में असंतुलन की शिकायतें सामने आती थीं।
सरकार के नए आदेश के तहत अब तीनों शहरों में केवल एक नगर निगम रहेगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित संभागीय आयुक्त के पास होगी।
महापौरों और पार्षदों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब उनके सभी प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार रद्द कर दिए गए हैं। नगर निगमों के दैनिक कार्य, बजट अनुमोदन, और नीतिगत फैसले अब प्रशासक यानी आयुक्त के नेतृत्व में होंगे।
संरचना और प्रशासनिक ढांचा
नई व्यवस्था के तहत एक संभागीय आयुक्त के साथ एक आईएएस अधिकारी और दो आरएएस अधिकारी को अतिरिक्त आयुक्तों के रूप में नियुक्त किया जा सकेगा। यह टीम निगम के विभिन्न विभागों की निगरानी करेगी — जैसे सफाई, कर संग्रह, भवन निर्माण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, और यातायात प्रबंधन।
सरकार अब एकीकृत निगमों में नई जोन सीमाओं का निर्धारण करने की प्रक्रिया भी शुरू कर रही है। इसका उद्देश्य प्रशासनिक क्षेत्र को संतुलित बनाना और नागरिक सेवाओं को अधिक सुलभ बनाना है।
नागरिक सेवाएं रहेंगी जारी
पूनम ने बताया कि जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, विवाह पंजीकरण, संपत्ति कर भुगतान, सफाई व्यवस्था जैसे सभी कार्य पहले की तरह चलते रहेंगे। उन्होंने कहा, “लोगों को अपने रोजमर्रा के कामों में किसी तरह की रुकावट नहीं आने दी जाएगी। प्रशासनिक बदलाव नागरिकों के हित में है और इससे शहर के कामकाज में तेजी आएगी।”
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी प्राथमिकता जयपुर के हेरिटेज लुक को सुरक्षित रखना, सफाई व्यवस्था में सुधार करना और ट्रैफिक प्रबंधन को बेहतर बनाना होगी।
जोधपुर और कोटा में भी नई व्यवस्था लागू
जयपुर की तरह ही जोधपुर और कोटा में भी अब केवल एक-एक नगर निगम रहेगा। इससे पहले इन शहरों में उत्तर और दक्षिण निगम के रूप में दो बोर्ड संचालित होते थे। अब दोनों के विलय के बाद एकीकृत निगम व्यवस्था लागू कर दी गई है।
जोधपुर में पहले उत्तर निगम में कांग्रेस और दक्षिण निगम में भाजपा का बोर्ड था, जबकि कोटा में भी यही विभाजन था। अब दोनों शहरों में यह व्यवस्था खत्म हो गई है और एक संयुक्त निगम प्रशासन कार्यभार संभाल रहा है।
एकीकृत मॉडल से होगा संतुलित विकास
राज्य सरकार का मानना है कि तीनों शहरों में एकीकृत नगर निगम व्यवस्था लागू होने से प्रशासनिक समन्वय बेहतर होगा, संसाधनों का समान वितरण संभव होगा, और विकास योजनाओं में गति आएगी।


