मनीषा शर्मा, अजमेर। अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के 814वें उर्स के दौरान शनिवार को दरगाह शरीफ पूरी तरह रूहानी रंग में डूबी रही। अहाता-ए-नूर में परंपरा के अनुसार छठी की फातिहा की गई, जिसके साथ जायरीनों ने अमन, खुशहाली और भाईचारे की दुआएं मांगी। इसके बाद महफिल खाने में कुल की महफिल सजी, जहां सूफी परंपरा के मुताबिक दुआ, जिक्र और नात पढ़ी गई।
दोपहर के समय दरगाह दीवान के पुत्र सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती जन्नती दरवाजे से होते हुए आस्ताना शरीफ पहुंचे और गुस्ल की रस्म अदा की। उनके अंदर प्रवेश करते ही परंपरा के अनुसार जन्नती दरवाजा बंद कर दिया गया। यह वह क्षण था, जिसका जायरीन साल-भर इंतजार करते हैं, क्योंकि इसी के साथ उर्स की रस्में अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचती हैं।
कुल की रस्म अदा होते ही उर्स का विधिवत समापन घोषित किया गया और बाहर से आए हजारों जायरीनों ने लौटना शुरू किया। लेकिन पूरे दिन दरगाह का माहौल आध्यात्मिक भाव से भरा रहा और लोग लगातार जियारत और दुआ के लिए पहुंचते रहे।
छठी शरीफ को उर्स का सबसे पवित्र दिन माना जाता है। सुबह से शाम तक दरगाह परिसर में इबादत, जिक्र-ओ-अज़कार और सूफी माहौल का अनोखा संगम देखने को मिला। दरगाह दीवान के पुत्र ने महफिल खाने में शाही महफिल सजाई, जिसमें मशहूर शाही कव्वालों ने अपने कलाम पेश किए। कव्वालियों की गूंज के साथ महफिल में बैठे जायरीन भावुक हो उठे और अल्लाह से रहमत की दुआ करते रहे।
कुल की रस्म में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। रस्म पूरी होते ही जन्नती दरवाजा फिर से बंद कर दिया गया, जो उर्स की खास पहचान माना जाता है। इसके बाद मलंगों और कलंदरों ने महफिल खाने में दागोल की रस्म निभाई। इसी क्रम में खादिमों ने एक-दूसरे की दस्तारबंदी की और उर्स की मुबारकबाद दी।
दरगाह परिसर में पूरे दिन नजर-ओ-नियाज और लंगर का सिलसिला जारी रहा। दूर-दराज़ से आए हजारों जायरीनों ने लंगर में हिस्सा लिया और इसे सूफी परंपरा की अनूठी मिसाल बताया। कई परिवारों ने इसे अपनी मनोकामनाएं पूरी होने के बाद शुक्राने की दावत के रूप में भी पेश किया।
814वां उर्स एक बार फिर इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि ख्वाजा गरीब नवाज की शिक्षा—मानवता, प्रेम, समानता और करुणा—आज भी दुनिया भर के लोगों को जोड़ती है। दरगाह से लौटते हुए जायरीनों ने इस रूहानी अनुभव को जीवन-भर याद रखने योग्य बताया।


