जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) ने हाल ही में अपने अधिकार क्षेत्र का विस्तार करते हुए 679 नए गांवों को शामिल किया और डेवलपमेंट प्रमोशन एंड कंट्रोल रेगुलेशन लागू कर दिया। इस निर्णय को शहरी नियोजन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा था, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके उलट प्रभाव सामने आ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि पर अवैध कॉलोनियों का सृजन तेजी से बढ़ गया है और इसका लाभ भूमाफिया तथा बिल्डर्स उठा रहे हैं। आम ग्रामीण और प्लॉट खरीदने वाले लोग नियमों की जानकारी के अभाव में भ्रमित हो रहे हैं।
क्षेत्र विस्तार के बाद बढ़ी जमीनों की मांग
जेडीए के दायरे में शामिल होने के बाद चौमूं, शाहपुरा, बस्सी, तूंगा, जमवारामगढ़, आंधी, सांगानेर, झोटवाड़ा, आमेर, चाकसू, फुलेरा, मोजमाबाद, सांभर, फागी और कोटखावदा सहित कई तहसीलों में जमीनों के दाम अचानक बढ़ गए हैं। पहले जो कृषि भूमि अपेक्षाकृत सस्ती थी, वह अब कॉलोनी के नाम पर कई गुना अधिक कीमत पर बेची जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि जेडीए क्षेत्र में शामिल होने की खबर के बाद से ही जमीनों की खरीद-फरोख्त में तेजी आ गई है।
भूमाफिया खेतों में कच्ची सड़कें बनाकर और छोटे-छोटे प्लॉट काटकर यह प्रचार कर रहे हैं कि जल्द ही ये कॉलोनियां वैध घोषित हो जाएंगी। इससे आम लोग भविष्य में नियमितीकरण की उम्मीद में प्लॉट खरीद रहे हैं। कई मामलों में खरीदारों को यह तक नहीं बताया जाता कि भूमि का कन्वर्जन हुआ है या नहीं और वह मास्टर प्लान में किस श्रेणी में आती है।
अवैध कॉलोनियों का जाल
जयपुर रोड और चौमूं के आसपास की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बताई जा रही है। यहां कई स्थानों पर अवैध कॉलोनियां विकसित की जा रही हैं। बस्सी से कानोता के बीच भी दर्जनों कॉलोनियां काटी जा चुकी हैं या निर्माणाधीन हैं। बाजार में इन कॉलोनियों के नक्शे खुलेआम घूम रहे हैं और संभावित खरीदारों को आकर्षित किया जा रहा है।
हालांकि जेडीए समय-समय पर कार्रवाई करता है, लेकिन यह कार्रवाई अधिकतर औपचारिक नजर आती है। कुछ दिन पहले चौमूं में अवैध कॉलोनियों में सड़कें उखाड़ी गई थीं, लेकिन निगरानी के अभाव में कई जगह निर्माण कार्य फिर से शुरू हो गया। इससे यह संकेत मिलता है कि अवैध निर्माणों पर स्थायी रोक लगाने के लिए सख्त और निरंतर कार्रवाई की आवश्यकता है।
मास्टर प्लान के अमल में आएंगी चुनौतियां
जब जेडीए अपने मास्टर प्लान को पूरी तरह लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगा, तब इन अवैध निर्माणों को हटाना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। एक बार जब प्लॉट बिक जाते हैं और लोग वहां मकान बना लेते हैं, तो उन्हें हटाना प्रशासन के लिए कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टियों से जटिल हो जाता है। ऐसे में मास्टर प्लान और वास्तविक स्थिति के बीच टकराव की संभावना बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र विस्तार के साथ-साथ सख्त निगरानी तंत्र और जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है। यदि समय रहते अवैध प्लॉटिंग पर रोक नहीं लगाई गई, तो भविष्य में शहर के सुव्यवस्थित विकास पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
ग्रामीणों और खरीदारों की दुविधा
ग्रामीणों का कहना है कि जमीन की कीमतें कई गुना बढ़ जाने से खेती योग्य भूमि का स्वरूप बदल रहा है। कुछ किसान ऊंचे दाम के लालच में जमीन बेच रहे हैं, जबकि कुछ लोग भविष्य की अनिश्चितता के कारण चिंतित हैं। खरीदार भी बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के प्लॉट खरीद रहे हैं। कई लोग कन्वर्जन की स्थिति, भूमि उपयोग श्रेणी और मास्टर प्लान की जानकारी लिए बिना ही निवेश कर रहे हैं।
बस्सी-कानोता क्षेत्र में कृषि भूमि को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर प्लॉट बेचे जा रहे हैं। इससे न केवल कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहा है, बल्कि अव्यवस्थित शहरीकरण का खतरा भी बढ़ रहा है। यदि ऐसी कॉलोनियां भविष्य में अवैध घोषित होती हैं, तो सबसे अधिक नुकसान आम खरीदारों को ही उठाना पड़ेगा।
प्रशासनिक सख्ती की जरूरत
वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि जेडीए के क्षेत्र विस्तार के साथ-साथ प्रभावी नियामक व्यवस्था की आवश्यकता है। केवल कार्रवाई दिखाने से समस्या का समाधान संभव नहीं है। अवैध कॉलोनियों की पहचान, प्लॉटिंग पर तत्काल रोक और खरीदारों को जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान जरूरी है। यदि प्रशासन समय रहते सख्ती नहीं बरतता, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है। अवैध निर्माणों को हटाने की कार्रवाई सामाजिक विरोध और कानूनी विवादों को जन्म दे सकती है। इसलिए संतुलित और पारदर्शी नीति के साथ नियोजन को लागू करना आवश्यक है।


