मनीषा शर्मा। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद पढ़ाई का स्तर और वहां की व्यवस्था उम्मीदों के मुताबिक न होना किसी भी छात्र के लिए निराशाजनक हो सकता है। राजस्थान के सीकर निवासी मुकुल शर्मा को इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ा जब उन्होंने पंजाब के एक मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया और जल्द ही वहां के वातावरण से असंतुष्ट होकर अपनी फीस वापस मांगी। कॉलेज ने उन्हें फीस लौटाने से मना कर दिया, तो उन्होंने न्याय पाने के लिए अदालत का सहारा लिया। अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए कॉलेज को 9% ब्याज सहित पूरी फीस लौटाने का आदेश दिया है।
कैसे शुरू हुआ मामला?
मुकुल शर्मा ने 2022 में अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद, उन्होंने भारत में इंटर्नशिप के लिए आवश्यक FMGB परीक्षा भी उत्तीर्ण की और इसी दौरान उन्हें पंजाब के पटियाला में एक कॉलेज में इंटर्नशिप के लिए चयनित कर लिया गया। उन्होंने कॉलेज में एडमिशन प्रक्रिया को पूरा करते हुए 1.40 लाख रुपए की फीस जमा कर दी। लेकिन जब वे इंटर्नशिप के लिए कॉलेज पहुंचे, तो उन्हें वहां का वातावरण और पढ़ाई की व्यवस्था बिल्कुल पसंद नहीं आई। मुकुल का दावा है कि कॉलेज में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के निर्देशों का पालन नहीं हो रहा था, जो एक मेडिकल कॉलेज में अनिवार्य होता है।
एडमिशन रद्द कर फीस वापसी की मांग
कॉलेज की व्यवस्थाओं से असंतुष्ट मुकुल ने एडमिशन रद्द करवाने का निर्णय लिया और कॉलेज से अपनी फीस वापसी की मांग की। कॉलेज प्रशासन ने शुरू में उनकी बात सुनते हुए सिर्फ 20,000 रुपए लौटाए, लेकिन शेष 1.20 लाख रुपए देने से मना कर दिया। इस स्थिति में मुकुल खुद को असहाय महसूस कर रहे थे और उनके पास न्याय पाने का कोई और रास्ता नहीं बचा। उन्होंने अंततः सीकर की लोक अदालत में इस मामले को उठाने का फैसला किया।
लोक अदालत का फैसला
सीकर लोक अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए मुकुल के हक में फैसला दिया। अदालत ने कॉलेज को आदेश दिया कि वह मुकुल को बाकी की शेष 1.20 लाख रुपए की राशि के साथ 9% वार्षिक ब्याज जोड़कर तीन महीने के भीतर लौटाए। यह निर्णय शिक्षा व्यवस्था में फीस वापसी के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण संदेश देने वाला साबित हुआ है और छात्रों के अधिकारों की रक्षा के प्रति कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।
क्या है इस मामले का महत्व?
शिक्षा के क्षेत्र में फीस वापसी से जुड़े मामले आमतौर पर विवादास्पद होते हैं। कई कॉलेज एडमिशन लेने के बाद फीस वापस नहीं करते, भले ही छात्रों को कॉलेज में पढ़ाई या अन्य व्यवस्थाएं संतोषजनक न लगें। इस मामले ने ऐसे ही एक मुद्दे को उजागर किया है। कोर्ट का यह फैसला छात्रों के लिए एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है कि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों और यदि कहीं भी असंतोष या धोखाधड़ी का अनुभव हो, तो न्याय पाने के लिए अदालत का सहारा ले सकते हैं।
क्यों जरूरी है शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता?
शिक्षा संस्थान छात्रों को बेहतरीन शिक्षण और सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के उद्देश्य से कार्यरत होते हैं। परंतु, जब कॉलेज प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों में कोताही बरतते हैं, तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों को ही उठाना पड़ता है। मुकुल शर्मा के मामले में भी यही देखा गया। मेडिकल जैसे पेशे में जहां कड़ी शिक्षा और गुणवत्ता का होना अनिवार्य है, वहां कॉलेज में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के निर्देशों की अनदेखी होना एक गंभीर मुद्दा है।
फीस वापसी के कानूनी अधिकार और कॉलेजों की जिम्मेदारी
इस केस के परिणामस्वरूप यह भी स्पष्ट हुआ कि छात्रों का फीस वापसी पर कानूनी अधिकार है। शिक्षा संस्थानों को अपनी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जिम्मेदारी का पालन करना चाहिए। मुकुल का केस उन छात्रों के लिए भी मार्गदर्शक है जो किसी भी कारणवश अपने कॉलेज की व्यवस्थाओं से संतुष्ट नहीं हैं और अपनी फीस वापसी की मांग कर रहे हैं।
शिक्षा मंत्री और सरकारी कार्रवाई का सुझाव
ऐसे मामले शिक्षा विभाग और मंत्रालय के लिए चेतावनी के तौर पर देखे जा सकते हैं कि छात्रों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए सख्त नियम बनाए जाएं। इस फैसले के बाद संभव है कि छात्रों की फीस वापसी की प्रक्रियाओं पर नजर रखने के लिए शिक्षा मंत्रालय और अन्य संबंधित संस्थाएं जरूरी कदम उठाएं और फीस वापसी की नीति को स्पष्ट करें। इससे छात्रों को अपने भविष्य के लिए बिना किसी दुविधा के सही कॉलेज और पाठ्यक्रम चुनने में मदद मिल सकेगी।