मनीषा शर्मा। आज के समय में होम लोन, पर्सनल लोन या कार लोन लेना आम बात हो गई है। लोन लेते समय सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि हर महीने कितनी EMI देनी पड़ेगी। कई लोग यह मान लेते हैं कि बैंक मनमाने तरीके से EMI तय कर देता है, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। दरअसल, बैंक एक तय गणितीय फॉर्मूले के आधार पर EMI की गणना करते हैं। इस फॉर्मूले में तीन मुख्य बातें शामिल होती हैं—लोन की राशि, ब्याज दर और लोन की अवधि। हाल के दिनों में RBI द्वारा रेपो रेट में कटौती के बाद यह चर्चा और तेज हो गई है कि क्या EMI कम होगी या नहीं। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि EMI आखिर बनती कैसे है और किन कारकों पर निर्भर करती है।
बैंक EMI निकालने के लिए कौन सा फॉर्मूला अपनाते हैं
बैंक और वित्तीय संस्थान EMI कैलकुलेट करने के लिए एक स्टैंडर्ड फॉर्मूला इस्तेमाल करते हैं:
EMI = P × R × (1+R)^N / [(1+R)^N – 1]
इस फॉर्मूले में:
P का मतलब है लोन की मूल राशि यानी Principal
R से आशय है मंथली ब्याज दर
N लोन की कुल अवधि, जो महीनों में होती हैयही फॉर्मूला तय करता है कि हर महीने आपको कितनी EMI चुकानी होगी। इसमें न कोई अनुमान होता है और न ही कोई मनमानी।
सालाना ब्याज दर को मंथली कैसे बनाया जाता है
EMI निकालते समय एक अहम बात यह होती है कि बैंक सालाना ब्याज दर को पहले मंथली ब्याज दर में बदलते हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी लोन पर सालाना ब्याज दर 7.2 प्रतिशत है, तो इसे पहले 12 से भाग दिया जाता है और फिर 100 से डिवाइड किया जाता है।
इस तरह मंथली ब्याज दर होगी:
R = 7.2 / 12 / 100 = 0.006यही मंथली रेट EMI फॉर्मूले में इस्तेमाल होती है।
उदाहरण से समझें EMI का पूरा कैलकुलेशन
अब इसे एक आसान उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने 10 लाख रुपये का लोन 10 साल यानी 120 महीनों के लिए लिया है और उस पर सालाना ब्याज दर 7.2 प्रतिशत है।
फॉर्मूले के अनुसार: EMI = 10,00,000 × 0.006 × (1 + 0.006)^120 / [(1 + 0.006)^120 – 1]
इस कैलकुलेशन के बाद उस व्यक्ति की EMI लगभग 11,714 रुपये प्रति माह के आसपास बनती है। इसका मतलब है कि उसे 10 साल तक हर महीने करीब 11,714 रुपये बैंक को चुकाने होंगे।
ऑनलाइन EMI कैलकुलेटर का आसान विकल्प
हालांकि आज के समय में ग्राहकों को खुद से इतना लंबा कैलकुलेशन करने की जरूरत नहीं पड़ती। लगभग सभी बैंकों और फाइनेंस वेबसाइट्स पर ऑनलाइन EMI कैलकुलेटर उपलब्ध होते हैं। इनमें आपको सिर्फ लोन अमाउंट, ब्याज दर और टेन्योर डालना होता है और EMI तुरंत स्क्रीन पर आ जाती है। लेकिन फिर भी EMI का फॉर्मूला समझना जरूरी है, ताकि आप जान सकें कि EMI किन आधारों पर तय होती है।
लोन टेन्योर बढ़ाने से EMI कम, लेकिन ब्याज ज्यादा
अक्सर लोग कम EMI के लालच में लोन का टेन्योर लंबा रख लेते हैं। यह सच है कि जैसे-जैसे लोन की अवधि बढ़ती है, वैसे-वैसे EMI कम हो जाती है। लेकिन इसका एक बड़ा नुकसान यह होता है कि कुल ब्याज काफी ज्यादा चुकाना पड़ता है। इसके उलट, कम टेन्योर वाले लोन में EMI थोड़ी ज्यादा होती है, लेकिन कुल ब्याज खर्च काफी कम रहता है। इसलिए लोन लेते समय सिर्फ EMI नहीं, बल्कि कुल भुगतान राशि को भी ध्यान में रखना चाहिए।
पहले से लिए गए लोन पर क्या विकल्प हैं
अगर आपने पहले से लंबी अवधि का लोन ले रखा है, तो भी घबराने की जरूरत नहीं है। आप बैंक से लोन री-स्ट्रक्चरिंग या प्रीपेमेंट का विकल्प चुन सकते हैं। इससे लोन की अवधि कम की जा सकती है। हालांकि, इसमें EMI थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन कुल ब्याज बोझ कम हो जाता है। इसके अलावा, ब्याज दरें आपके क्रेडिट स्कोर, लोन अमाउंट और टेन्योर पर भी निर्भर करती हैं। अच्छा क्रेडिट स्कोर होने पर आपको कम ब्याज दर पर लोन मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
समझदारी से EMI चुनना क्यों जरूरी है
कुल मिलाकर, EMI सिर्फ एक मासिक किस्त नहीं होती, बल्कि यह आपकी वित्तीय सेहत से जुड़ा फैसला है। सही EMI वही होती है जो आपकी मासिक आय पर भारी न पड़े और लंबे समय में आपको अनावश्यक ब्याज चुकाने से बचाए। इसलिए लोन लेने से पहले EMI कैलकुलेशन को समझना और अपने बजट के हिसाब से सही टेन्योर चुनना बेहद जरूरी है।


