राजस्थान में राज्य पशु ऊंट की लगातार घटती संख्या को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऊंट को राज्य पशु घोषित करने और इसके संरक्षण के लिए कानून बनाए जाने के बावजूद इसकी संख्या लगातार घटती जा रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून बनने के बाद ऊंटों की संख्या लगभग आधी रह गई है, लेकिन सरकार इस गंभीर मुद्दे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही है। यह टिप्पणी उस समय की गई जब अदालत राज्य पशु ऊंट की घटती संख्या को लेकर स्वप्रेरणा से दर्ज जनहित याचिका की सुनवाई कर रही थी। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया, जिसके बाद अदालत ने सुनवाई को 29 मार्च तक के लिए स्थगित कर दिया।
स्वप्रेरणा से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई
मामले की सुनवाई पुष्पेंद्र सिंह भाटी और विनीत माथुर की खंडपीठ के समक्ष हुई। अदालत ने राज्य पशु की संख्या में लगातार आ रही गिरावट को गंभीर विषय मानते हुए इस पर स्वतः संज्ञान लिया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार से पूछा कि जब ऊंट को राज्य पशु घोषित कर उसके संरक्षण के लिए कानून बनाया गया था, तब इसके बावजूद संख्या में लगातार गिरावट क्यों हो रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए और ठोस कदम उठाने चाहिए।
चार साल से सरकार का जवाब लंबित
मामले में न्यायमित्र के रूप में नियुक्त अधिवक्ता प्रतीक कासलीवाल ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने इस मामले में लंबे समय से कोई ठोस जवाब प्रस्तुत नहीं किया है। उन्होंने कहा कि अदालत ने जुलाई 2022 में सरकार से जवाब मांगा था, लेकिन चार साल के करीब समय बीत जाने के बाद भी इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार द्वारा बनाए गए कानून के बावजूद ऊंटों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, जो चिंताजनक है।
वर्षों में तेजी से घटती गई ऊंटों की संख्या
अधिवक्ता कासलीवाल ने अदालत के समक्ष ऊंटों की संख्या से जुड़े आंकड़े भी प्रस्तुत किए। उनके अनुसार वर्ष 2004 में राजस्थान में लगभग साढ़े सात लाख ऊंट थे। हालांकि समय के साथ इनकी संख्या में लगातार कमी आती गई।
वर्ष 2015 में जब राज्य सरकार ने ऊंट को राज्य पशु घोषित करते हुए संरक्षण कानून बनाया, उस समय तक ऊंटों की संख्या घटकर लगभग 3.26 लाख रह गई थी। इसके बाद भी गिरावट का सिलसिला नहीं रुका और अगले कुछ वर्षों में यह संख्या घटकर करीब 2.13 लाख तक पहुंच गई। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 तक प्रदेश में ऊंटों की संख्या लगभग डेढ़ लाख के आसपास रह गई। इस प्रकार पिछले दो दशकों में ऊंटों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
कानून बनने के बाद बढ़ी पशुपालकों की परेशानी
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि वर्ष 2015 में राज्य सरकार ने ऊंटों के संरक्षण के उद्देश्य से कानून बनाया था, जिसके तहत ऊंटों की बिक्री और वध पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। हालांकि इस कानून का पशुपालकों पर अप्रत्याशित असर भी पड़ा। कानून लागू होने के बाद पशु मेलों में ऊंटों की खरीद-बिक्री लगभग पूरी तरह बंद हो गई। इसके कारण ऊंट पालने वाले पशुपालकों के लिए आर्थिक रूप से यह व्यवसाय कम लाभदायक हो गया। धीरे-धीरे पशुपालकों की इस पारंपरिक पेशे में रुचि कम होने लगी।
परिवहन प्रक्रिया भी बनी बड़ी समस्या
ऊंटों के संरक्षण कानून के तहत ऊंट को एक जिले से दूसरे जिले में या राज्य के बाहर ले जाने के लिए जिला कलेक्टर से अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया। यह प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली बताई जाती है। पशुपालकों का कहना है कि इस अनुमति प्रक्रिया में कई बार महीनों लग जाते हैं, जिससे उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में कई पशुपालक ऊंट पालने से दूर होते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों ने उठाए अन्य मुद्दे
ऊंट संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा कानून केवल ऊंटों के वध को रोकने पर केंद्रित है, जबकि उनके संरक्षण के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार प्रदेश में चरागाहों की कमी भी ऊंटों की घटती संख्या का एक बड़ा कारण है। इसके अलावा ऊंट से मिलने वाले उत्पादों जैसे ऊंटनी के दूध और उससे बनने वाले अन्य उत्पादों के लिए बाजार विकसित करने की दिशा में भी पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए हैं। यदि इन क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए तो ऊंट पालने वाले पशुपालकों को आर्थिक लाभ मिल सकता है और इससे इस परंपरागत पशुपालन को बढ़ावा मिल सकता है।
सरकार ने भी माना था संशोधन की जरूरत
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि राज्य सरकार ने स्वयं वर्ष 2022 में विधानसभा में एक सवाल के जवाब में माना था कि ऊंट संरक्षण से जुड़े कानून में कुछ संशोधन करने की आवश्यकता है। सरकार ने उस समय यह स्वीकार किया था कि वर्तमान कानून में कुछ व्यावहारिक समस्याएं हैं और पशुपालकों को राहत देने के लिए इसमें बदलाव किए जा सकते हैं। हालांकि इस स्वीकारोक्ति के बावजूद अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
अगली सुनवाई पर टिकी नजरें
फिलहाल इस मामले में राज्य सरकार ने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा है, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई की तारीख 29 मार्च निर्धारित की है। अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर टिकी हुई है, जहां यह स्पष्ट हो सकेगा कि राज्य सरकार ऊंटों की घटती संख्या को रोकने और राज्य पशु के संरक्षण के लिए क्या ठोस कदम उठाने जा रही है। राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले ऊंट के संरक्षण को लेकर यह मामला आने वाले दिनों में और अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।


