राजस्थान हाईकोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी और संचार विभाग में कथित घोटाले की जांच में हो रही देरी पर गंभीर नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने एंटी करप्शन ब्यूरो को निर्देश दिया है कि मामले से जुड़े 23 टेंडरों की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों के नाम तीन दिन के भीतर सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं।
यह आदेश जस्टिस अशोक कुमार जैन की अदालत ने सोमवार को टीएन शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि जांच में प्रगति नहीं हुई तो संबंधित एजेंसियों को जवाबदेही तय करनी पड़ सकती है। मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च को निर्धारित की गई है।
लंबे समय से लंबित है जांच
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह मुद्दा उठाया गया कि डीओआईटी-सी से जुड़े कथित घोटाले की जांच लंबे समय से लंबित है और एसीबी द्वारा इस मामले में अपेक्षित कार्रवाई नहीं की जा रही है। अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार शिकायतकर्ता ने कई बार दस्तावेज और सबूत जांच एजेंसी को उपलब्ध कराए, लेकिन उसके बावजूद जांच प्रक्रिया में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।
अदालत ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए एसीबी से स्पष्ट जवाब मांगा है। न्यायालय ने कहा कि यदि भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों में ठोस दस्तावेज उपलब्ध हैं तो जांच एजेंसी को समयबद्ध तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए।
कोर्ट के आदेश के बावजूद जांच में सुस्ती
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता पूनमचंद भंडारी ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता ने घोटाले से संबंधित कई महत्वपूर्ण दस्तावेज एसीबी को सौंपे हैं। इसके बावजूद जांच एजेंसी ने मामले को गंभीरता से आगे नहीं बढ़ाया।
उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि 6 सितंबर 2024 को दिए गए कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने छह ऑडिट अधिकारियों को भी एसीबी की सहायता के लिए उपलब्ध कराया था। इन अधिकारियों का उद्देश्य टेंडर प्रक्रिया से जुड़े वित्तीय और तकनीकी पहलुओं की जांच करना था, ताकि घोटाले की सच्चाई सामने लाई जा सके।
हालांकि अधिवक्ता ने यह भी कहा कि इन सभी कदमों के बावजूद जांच में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। उनके अनुसार यह स्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि जांच एजेंसी मामले को गंभीरता से नहीं ले रही है।
एसीबी पर अपराधियों को बचाने का आरोप
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने एसीबी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि एजेंसी इस मामले में आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि जब शिकायतकर्ता ने विस्तृत दस्तावेज और वित्तीय लेनदेन से जुड़े प्रमाण प्रस्तुत किए हैं तो जांच को आगे बढ़ाने में इतनी देरी समझ से परे है।
अदालत को बताया गया कि अब तक केवल एक अधिकारी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, जबकि आरोपों के अनुसार टेंडर प्रक्रिया में कई अधिकारियों और संबंधित फर्मों की भूमिका सामने आई है। इसके बावजूद किसी अन्य अधिकारी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
एसीबी ने मांगा समय
मामले में एसीबी की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता भुवनेश शर्मा अदालत में पेश हुए। उन्होंने अदालत से प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कुछ समय की मांग की। उनका कहना था कि जांच जारी है और एजेंसी जल्द ही मामले से संबंधित जानकारी अदालत के सामने प्रस्तुत करेगी।
हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि मामले में और अधिक देरी स्वीकार्य नहीं होगी। इसी कारण कोर्ट ने तीन दिन के भीतर संबंधित अधिकारियों के नाम सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी का आरोप
मामले की शुरुआत शिकायतकर्ता टीएन शर्मा द्वारा लगाए गए आरोपों से हुई थी। उन्होंने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर डीओआईटी-सी के अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनके अनुसार विभाग में 23 टेंडरों की प्रक्रिया में अनियमितताएं की गईं और कुछ खास फर्मों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन टेंडरों को दिलाने के बदले संबंधित अधिकारियों को भारी कमीशन दिया गया। उनका दावा है कि इस कमीशन की रकम अधिकारियों के रिश्तेदारों के बैंक खातों में जमा कराई गई। उन्होंने इन वित्तीय लेनदेन से जुड़े दस्तावेज भी एसीबी को उपलब्ध कराए हैं।
करोड़ों रुपए के फर्जीवाड़े का दावा
याचिकाकर्ता का कहना है कि टेंडर प्रक्रिया में की गई कथित अनियमितताओं के कारण सरकारी खजाने को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है। उनके अनुसार यदि इस मामले की निष्पक्ष और गहन जांच की जाए तो कई बड़े खुलासे हो सकते हैं।
उन्होंने अदालत से मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करवाई जाए ताकि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सके। उनका यह भी कहना है कि यदि समय रहते इस मामले में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इससे सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने भ्रष्टाचार के मामलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि न्यायपालिका ऐसे मामलों को गंभीरता से लेती है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं तो संबंधित एजेंसियों का कर्तव्य है कि वे निष्पक्ष और समयबद्ध जांच सुनिश्चित करें।
अदालत ने एसीबी को यह भी संकेत दिया कि जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसी के तहत अधिकारियों के नाम सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है ताकि अदालत स्वयं मामले की प्रगति की निगरानी कर सके।
अगली सुनवाई 13 मार्च को
मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च को निर्धारित की गई है। इस दौरान अदालत एसीबी द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों और अधिकारियों के नामों की समीक्षा करेगी। इसके बाद ही यह तय होगा कि जांच को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत इस मामले में सख्त रुख बनाए रखती है तो इससे जांच प्रक्रिया में तेजी आ सकती है और कथित घोटाले से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच संभव हो सकती है।


