मनीषा शर्मा। राजस्थान में जर्जर स्कूल भवनों की स्थिति पर अब अदालत ने सख्त रुख अपना लिया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार को स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मरम्मत कार्य सिर्फ कागजों में नहीं बल्कि धरातल पर दिखना चाहिए। कोर्ट ने इस मामले में स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने के भी संकेत दिए हैं। यह मामला झालावाड़ में स्कूल की इमारत गिरने की घटना के बाद स्वतः संज्ञान से शुरू हुआ है।
कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
न्यायमूर्ति महेन्द्र गोयल और न्यायमूर्ति अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से कई सख्त सवाल किए। कोर्ट ने कहा कि आज भी कई जगहों पर स्कूल टीनशेड के नीचे संचालित हो रहे हैं, जो बच्चों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। अदालत ने कहा कि सरकार सिर्फ बजट की बात कर रही है लेकिन जमीन पर कुछ भी ठोस काम दिखाई नहीं दे रहा।
इस दौरान महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने अदालत में शपथ पत्र प्रस्तुत कर मरम्मत कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सरकार ने जर्जर भवनों की मरम्मत के लिए 5 लाख रुपये का बजट तय किया है और काम मार्च तक पूरा करने की योजना है। इस पर अदालत ने सख्त सवाल उठाते हुए पूछा कि इतने कम बजट में मरम्मत कैसे होगी। अदालत ने कहा कि लाखों रुपये तो सिर्फ रंग-सफेदी में ही खर्च हो जाते हैं।
5 लाख में मरम्मत योजना पर कोर्ट का सवाल
अदालत ने सरकार से पूछा कि बिना तकनीकी जांच के सतही तौर पर राशि तय करना क्या उचित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह की योजनाएं बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ हैं। महाधिवक्ता ने सफाई देते हुए कहा कि जरूरत पड़ी तो बजट में और राशि जोड़ी जाएगी। अदालत ने इस जवाब को लेकर भी असंतोष जताया और कहा कि अब वक्त आ गया है कि काम में पारदर्शिता और गुणवत्ता लाई जाए।
स्वतंत्र जांच एजेंसी से निरीक्षण की मंशा
कोर्ट ने कहा कि इस समय पीडब्ल्यूडी द्वारा निरीक्षण पर्याप्त नहीं है क्योंकि ठेकेदारों की लापरवाही से हादसे होते रहे हैं। इसलिए इस बार मरम्मत और निर्माण कार्य की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि अब केवल रिपोर्टों से काम नहीं चलेगा, परिणाम धरातल पर दिखने चाहिए।
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि 31 अक्टूबर तक स्वतंत्र जांच एजेंसी का नाम सुझाया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि सरकार को इस पूरी प्रक्रिया के लिए एक ठोस और विस्तृत योजना पेश करनी होगी।
बजट और समयसीमा पर भी सवाल
सरकार ने अदालत में बताया कि कुल बजट का 11.46 प्रतिशत हिस्सा जर्जर स्कूलों की मरम्मत पर स्वीकृत किया गया है। इसके तहत अत्यधिक जर्जर स्कूलों की मरम्मत मार्च 2026 तक और अन्य स्कूलों की मरम्मत नवंबर 2026 तक पूरी करने का लक्ष्य है। इस पर कोर्ट ने दो टूक कहा कि यह समयसीमा बहुत लंबी है और बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता है।
31 अक्टूबर तक राज्य को पेश करनी होगी योजना
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को तय की है। साथ ही सभी पक्षों को स्वतंत्र एजेंसी के नाम सुझाने को कहा गया है। अदालत ने कहा कि यह मामला केवल मरम्मत का नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार से जुड़ा हुआ है। इसलिए कोई भी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल
राजस्थान में कई सरकारी स्कूलों की इमारतें जर्जर स्थिति में हैं। कई जगहों पर छात्र टीनशेड के नीचे या खुले में पढ़ने को मजबूर हैं। अदालत के इस हस्तक्षेप के बाद अब राज्य सरकार पर जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए तो आने वाले समय में यह बड़ा चुनावी मुद्दा भी बन सकता है।


