latest-newsजयपुरराजनीतिराजस्थान

हाईकोर्ट ने 9 साल बाद सहकारी बैंकों की पुराने नोट बदलने की मांग खारिज की

हाईकोर्ट ने 9 साल बाद सहकारी बैंकों  की पुराने नोट बदलने की मांग खारिज की

शोभना शर्मा।  राजस्थान में केंद्रीय सहकारी बैंकों (DCCB) और प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों (PACS) को नोटबंदी से जुड़े एक पुराने मामले में बड़ा झटका लगा है। राजस्थान हाईकोर्ट ने नोटबंदी के नौ साल बाद 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बदलने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को पूरी तरह वैध और सार्वजनिक हित में बताया है। इस फैसले के साथ ही सहकारी बैंकों और समितियों की ओर से दायर सभी याचिकाएं निरस्त कर दी गई हैं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि नोटबंदी जैसे असाधारण आर्थिक निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा सीमित होती है।

कितनी राशि को लेकर था विवाद

याचिकाकर्ता सहकारी बैंकों और समितियों के पास नोटबंदी के समय बड़ी मात्रा में पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट जमा थे। यह राशि कुल मिलाकर करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये बताई गई। इन संस्थाओं का कहना था कि आरबीआई द्वारा पुराने नोट बदलने से मना किए जाने के कारण उनकी कार्यशील पूंजी पर गंभीर असर पड़ा और आर्थिक गतिविधियां बाधित हुईं।

किसने दायर की थी याचिका

इस मामले में मुख्य याचिका दुधू ग्राम सेवा सहकारी समिति लिमिटेड सहित कुल सात सहकारी समितियों की ओर से दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि 8 नवंबर 2016 को केंद्र सरकार ने आरबीआई अधिनियम, 1934 की धारा 26(2) के तहत अधिसूचना जारी कर पुराने नोटों को बैंकिंग चैनलों के माध्यम से जमा करने की अनुमति दी थी। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दलील दी कि जिला केंद्रीय सहकारी बैंक भी लाइसेंस प्राप्त बैंक हैं, इसलिए उन्हें पुराने नोट स्वीकार करने और जमा करने से रोका नहीं जाना चाहिए था।

अनुच्छेद 14 के उल्लंघन का आरोप

याचिका में कहा गया कि नोटबंदी के समय उनके पास करीब 16.17 लाख रुपये के पुराने नोट थे, जिन्हें जमा न कर पाने से उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई। साथ ही यह तर्क भी दिया गया कि आरबीआई द्वारा जारी 17 नवंबर 2016 के परिपत्र, 8 नवंबर की सरकारी अधिसूचना के विपरीत थे। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ सहकारी संस्थाओं को प्रारंभिक दिनों में पुराने नोट स्वीकार करने की अनुमति दी गई, जबकि अन्य को नहीं, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

आरबीआई और केंद्र सरकार की दलील

वहीं केंद्र सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से अदालत में कहा गया कि नोटबंदी एक असाधारण आर्थिक निर्णय था, जिसे देश की अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता और काले धन पर रोक के उद्देश्य से लागू किया गया था। इस तरह के निर्णय में संचालन संबंधी दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार आरबीआई को प्राप्त है। आरबीआई ने तर्क दिया कि सहकारी बैंकों की ऑडिट प्रणाली, तकनीकी क्षमता और निगरानी ढांचे को देखते हुए वहां पुराने नोटों के दुरुपयोग की आशंका अधिक थी। इसी वजह से अस्थायी रूप से सहकारी बैंकों और PACS पर पुराने नोट स्वीकार करने पर प्रतिबंध लगाया गया था।

हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने आरबीआई के पक्ष को स्वीकार करते हुए कहा कि 17 नवंबर 2016 को जारी किए गए सभी परिपत्र पूरी तरह वैधानिक, तर्कसंगत और सार्वजनिक हित में थे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह नोटबंदी की नीति की संवैधानिक वैधता पर विचार नहीं कर रही है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ पहले ही नोटबंदी को संवैधानिक ठहरा चुकी है।

भेदभाव के आरोप खारिज

हाईकोर्ट ने कहा कि 8 नवंबर की अधिसूचना ने किसी भी संस्था को पुराने नोट स्वीकार करने का अपरिवर्तनीय अधिकार नहीं दिया था, बल्कि यह पूरी तरह आरबीआई के निर्देशों के अधीन थी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी नीति का अलग-अलग संस्थाओं पर अलग प्रभाव पड़ता है, तो मात्र इसी आधार पर उसे भेदभाव नहीं कहा जा सकता, जब तक वर्गीकरण तार्किक और उद्देश्य से जुड़ा हो।

सभी याचिकाएं खारिज

अदालत ने सभी तर्कों को खारिज करते हुए सहकारी बैंकों और समितियों की सभी याचिकाएं निरस्त कर दीं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे बड़े आर्थिक और नीतिगत फैसलों में न्यायपालिका को अत्यधिक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

post bottom ad

Discover more from MTTV INDIA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading