मनीषा शर्मा। राजस्थान हाईकोर्ट ने शहरी निकायों में तय समयसीमा के बाद भी चुनाव नहीं कराने पर राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि शहरी निकायों में प्रशासक बनाए रखना संविधान की भावना के विपरीत है और लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी हुई स्थानीय सरकार का होना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड ने शनिवार को सुनवाई करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को मूकदर्शक बने रहने और आंख मूंदने की अनुमति नहीं दी जा सकती। राज्य सरकार और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि तुरंत चुनाव की तारीख घोषित कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को बहाल किया जाए।
हाईकोर्ट ने 10 याचिकाएं की खारिज
यह फैसला उर्मिला अग्रवाल और अन्य द्वारा दायर की गई कुल 10 याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया। याचिकाओं में मांग की गई थी कि कार्यकाल पूरा होने के बाद याचिकाकर्ताओं को शहरी निकायों में अध्यक्ष या प्रशासक के रूप में बनाए रखा जाए।
कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि:
शहरी निकायों का कार्यकाल संविधान के अनुच्छेद 243-यू के अनुसार पांच वर्ष से अधिक नहीं हो सकता।
कार्यकाल समाप्त होने के बाद इसे छह महीने से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता।
जनवरी 2025 में कई निकायों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, फिर भी चुनाव नहीं कराए गए।
यह देरी संविधान के खिलाफ है और इससे स्थानीय शासन व विकास कार्य बाधित हो रहे हैं।
प्रशासक नियुक्त करने पर कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि शहरी निकायों में अधिकारियों या पूर्व प्रतिनिधियों को प्रशासक बनाकर रखना उचित नहीं है।
कार्यकाल खत्म होने के बाद किसी भी व्यक्ति को प्रशासक नियुक्त करने का अधिकार नहीं है।
ऐसा करने से स्थानीय शासन में रिक्तता आ जाती है और लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होती है।
जब तक चुनाव नहीं होते, तब तक जनता के प्रतिनिधि शासन से वंचित रहते हैं और विकास कार्यों की रफ्तार थम जाती है।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष और सरकार की दलील
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे 2020 में ग्राम पंचायत प्रतिनिधि चुने गए थे। जून 2021 में इन्हें शहरी निकायों में शामिल कर दिया गया और वे अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा सदस्य बने। लेकिन जनवरी 2025 में पांच साल का कार्यकाल पूरा होने पर इन्हें हटा दिया गया, जबकि कई अन्य पंचायतों में सरपंचों को प्रशासक बनाए रखा गया।
इस आधार पर उन्होंने इसे भेदभावपूर्ण करार देते हुए स्वयं को भी शहरी निकायों में प्रशासक बनाए रखने की मांग की।
वहीं, महाधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि पंचायत और शहरी निकायों के नियम और कानूनी प्रावधान अलग-अलग हैं। पंचायत प्रतिनिधियों को शहरी निकायों में वही अधिकार नहीं दिए जा सकते। इसलिए याचिकाकर्ताओं की मांग स्वीकार्य नहीं है।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनाव जरूरी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि स्थानीय निकाय लोकतंत्र की नींव हैं। यदि चुनाव समय पर न हों, तो:
जनता और सरकार के बीच की कड़ी टूट जाती है।
विकास कार्यों में रुकावट आती है।
जनता की आवाज को मंच नहीं मिल पाता।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि जल्द से जल्द चुनाव की घोषणा करें और लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत बनाएं।


