शोभना शर्मा। राजस्थान हाई कोर्ट ने शुक्रवार को पुलिस महकमे में हलचल मचाने वाला बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने मादक पदार्थ तस्करी (Drug Trafficking) से जुड़े एक मामले में पुलिस की संदिग्ध भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कानून की रक्षा करने वाले ही अगर अपराधियों की तरह काम करेंगे तो जनता का विश्वास पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने इस मामले में तीन पुलिसकर्मियों—इंस्पेक्टर जितेंद्र सिंह, हेड कांस्टेबल स्वरूप राम और कांस्टेबल जोहरा राम—के खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Inquiry) जारी रखने का आदेश दिया है। वहीं, मुख्य आरोपी सत्यनारायण को अदालत ने सबूतों के अभाव में जमानत दे दी।
मामला कैसे शुरू हुआ?
यह पूरा प्रकरण जनवरी 2023 का है। बासनी थाने के तत्कालीन एसएचओ जितेंद्र सिंह और उनकी टीम ने एक ट्रक-टैंकर (RJ09-GD-2612) से 2240 किलो से अधिक डोडा-पोस्त जब्त किया था। पुलिस ने मौके से ट्रक ड्राइवर को गिरफ्तार भी किया। पूछताछ में ड्राइवर ने बताया कि यह माल सत्यनारायण के घर पर उतारने का निर्देश मिला था।
इसके बाद सत्यनारायण के बेटे मुकेश सुथार ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उसके पिता को इस केस से बाहर निकालने के लिए पुलिस ने 70 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी। बातचीत के बाद यह रकम 35 लाख रुपये पर तय हुई और यह पैसा हेड कांस्टेबल स्वरूप बिश्नोई को दिया गया।
रिश्वत के आरोपों की पुष्टि में CCTV फुटेज
मुकेश सुथार की शिकायत पर हाई कोर्ट ने मामले की गहन जांच करवाई। जांच के दौरान सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए। फुटेज में यह साफ हुआ कि पुलिस ने ट्रक को पहले किसी और जगह रोका था, लेकिन रिकॉर्ड में उसे थाने के सामने पकड़ा जाना दिखाया गया।
यह विसंगति अदालत के संज्ञान में आई और कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि यह पुलिस की मंशा पर गंभीर सवाल खड़ा करता है और यह संकेत देता है कि पूरी कार्रवाई में पारदर्शिता नहीं थी।
आरोपी को राहत, पुलिस पर सख्ती
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सत्यनारायण के खिलाफ कोई ठोस और पुख्ता सबूत नहीं है। उसका नाम केवल ट्रक ड्राइवर के बयान में आया है, जो खुद भी एक सह-आरोपी है। कानून की दृष्टि में केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
इसलिए, कोर्ट ने सत्यनारायण को 50,000 रुपये के व्यक्तिगत मुचलके और दो जमानतदारों की शर्त पर जमानत दी। वहीं, रिश्वत और संदिग्ध कार्रवाई में शामिल तीन पुलिसकर्मियों की विभागीय जांच जारी रखने का आदेश दिया।
हाई कोर्ट का सख्त रुख
जस्टिस फरजंद अली ने आदेश में कहा कि अगर कानून लागू करने वाले ही भ्रष्टाचार और अवैध गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं तो न्याय व्यवस्था पर गंभीर खतरा मंडराने लगेगा। अदालत ने इस आदेश की एक प्रति राजस्थान पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजने का निर्देश दिया ताकि इन पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में शामिल अन्य पुलिस अधिकारियों को क्लीन चिट दी गई है क्योंकि उनकी भूमिका सामान्य पाई गई।
पुलिस महकमे में मचा हड़कंप
इस फैसले के बाद राजस्थान पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। पुलिस विभाग पहले ही पेपर लीक और अन्य विवादों को लेकर सवालों के घेरे में रहा है, और अब इस तरह के आरोपों से उसकी छवि और धूमिल हो रही है।