मनीषा शर्मा। राजस्थान के अजमेर शहर में स्मार्ट सिटी योजना के तहत आनासागर झील क्षेत्र में बनाए गए सेवन वंडर, पाथवे और वेटलैंड संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई सोमवार को दो हफ्तों के लिए टाल दी गई। इस मामले में राज्य सरकार और याचिकाकर्ता अशोक मलिक दोनों के हलफनामों को सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि झील क्षेत्र में हुए अवैध निर्माणों को 17 सितंबर 2025 तक हटाना अनिवार्य है।
यह मामला न केवल पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा हुआ है, बल्कि शहरी विकास और वैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी पर भी सवाल खड़ा करता है।
राज्य सरकार ने हलफनामे में दी अपनी स्थिति की सफाई
राज्य सरकार की ओर से 7 पन्नों का एफिडेविट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया गया, जिसमें यह दावा किया गया कि आनासागर झील के मौजूदा वेटलैंड क्षेत्र को किसी भी रूप में परिवर्तित नहीं किया गया है। इसके विपरीत, सरकार ने दो नए स्थानों पर अतिरिक्त वेटलैंड विकसित करने की योजना प्रस्तुत की है।
इन दोनों वेटलैंड के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की गई है। तबीजी वेटलैंड के लिए 2.52 करोड़ रुपये और नानक्या तालाब के लिए 1.03 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है। इन प्रस्तावों की तकनीकी जांच प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान सीएसआईआर-नीरी द्वारा की गई है। साथ ही दोनों परियोजनाओं के लिए निविदा प्रक्रिया (NIT) भी जारी कर दी गई है।
सरकार का दावा है कि यह कदम पर्यावरणीय संतुलन को बहाल करने और अजमेर शहर के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने की दिशा में सकारात्मक प्रयास हैं।
परिवादी ने लगाए गंभीर आरोप
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता अशोक मलिक ने कोर्ट में 107 पन्नों का विस्तृत काउंटर एफिडेविट प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। उनके अनुसार, स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने झील के भीतर ही कंक्रीट का रास्ता बना दिया, जो स्पष्ट रूप से ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ में आता है।
इस अवैध निर्माण से न केवल झील की प्राकृतिक जलग्रहण प्रणाली बाधित हुई है, बल्कि बाढ़ का खतरा भी बढ़ गया है। मलिक ने अपने हलफनामे में यह भी कहा कि इस रास्ते के पीछे अवैध रूप से दुकानों और रेस्टोरेंट्स को संरक्षण देने की योजना बनाई गई थी, जिससे झील के किनारे का नैसर्गिक सौंदर्य और पर्यावरण दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
सेवन वंडर निर्माण पर उठे सवाल
एफिडेविट में याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से इस बात पर भी जोर दिया कि सेवन वंडर की संरचना न तो किसी वैधानिक अनुमति से बनाई गई है और न ही भूमि उपयोग परिवर्तन अथवा पर्यावरणीय स्वीकृति इसके लिए प्राप्त की गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही इन निर्माणों को अवैध घोषित किया जा चुका है, बावजूद इसके इन्हें अब तक नहीं हटाया गया है।
यह सीधे तौर पर न्यायिक आदेश की अवमानना का मामला बनता है। याचिकाकर्ता का दावा है कि प्रशासन ने जानबूझकर इन निर्माणों को जारी रखा है और अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।
पहले भी मिल चुका है समय
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन को सेवन वंडर और अन्य अवैध निर्माणों को हटाने के लिए छह महीने का समय दिया था, जिसकी समय सीमा 17 सितंबर 2025 को समाप्त हो रही है।


