मनीषा शर्मा। राजस्थान के अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की विश्वप्रसिद्ध दरगाह को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने दावा किया है कि दरगाह परिसर में प्राचीन संकट मोचन शिव मंदिर स्थित था, जिसे तोड़कर दरगाह का निर्माण किया गया। इस दावे को लेकर दायर याचिका पर शनिवार को अजमेर के सिविल कोर्ट में सुनवाई हुई। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) और अल्पसंख्यक विभाग की ओर से पेश किए गए प्रार्थना पत्रों पर बहस हुई। अब दरगाह कमेटी के प्रार्थना पत्र पर सुनवाई 6 सितंबर को होगी।
अदालत में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान एएसआई और अल्पसंख्यक विभाग के वकीलों ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता की ओर से नोटिस देने की प्रक्रिया में कई खामियां हैं। सरकार को पक्षकार बनाने की आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। वहीं, गुप्ता के वकील संदीप ने जवाब दिया कि यह अधिकार-क्षेत्र (jurisdiction) का मामला है और प्रार्थना पत्र दाखिल करना आवश्यक नहीं था। इसके बाद अदालत ने दरगाह कमेटी की ओर से पेश किए गए प्रार्थना पत्र पर सुनवाई की तारीख 6 सितंबर तय कर दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट परिसर में सिविल लाइन थाना पुलिस और अतिरिक्त पुलिस बल भी तैनात किया गया ताकि किसी तरह की अप्रिय स्थिति न बन पाए।
याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता का बयान
सुनवाई में मौजूद याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता ने पत्रकारों से कहा कि दरगाह कमेटी की ओर से पेश किए गए 7/11 प्रार्थना पत्र पर 6 सितंबर को सुनवाई होगी। उन्होंने कहा कि एएसआई और अल्पसंख्यक विभाग की ओर से पेश किए गए प्रार्थना पत्र पर जो बहस हुई है, उसके खारिज होने की संभावना अधिक है। गुप्ता ने स्पष्ट किया कि उनका दावा ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित है। उन्होंने बताया कि उनके पास 1250 ईस्वी की लिखी संस्कृत पुस्तक पृथ्वीराज विजय की कॉपी है, जिसमें अजमेर का इतिहास दर्ज है। इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद भी कोर्ट में पेश किया जाएगा।
हिंदू सेना के दावे के तीन आधार
याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता और हिंदू सेना ने अजमेर दरगाह को लेकर तीन प्रमुख आधारों पर दावा किया है—
दरवाजों की बनावट और नक्काशी
गुप्ता का कहना है कि दरगाह का बुलंद दरवाजा और परिसर की नक्काशी हिंदू मंदिरों से मेल खाती है। उनकी दलील है कि मंदिरों की पारंपरिक स्थापत्य कला को देखकर आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां पहले मंदिर रहा होगा।ऊपरी स्ट्रक्चर और गुंबद
याचिकाकर्ता का दावा है कि दरगाह के ऊपरी हिस्सों और गुंबदों में भी हिंदू मंदिरों के अवशेष जैसी संरचनाएं दिखाई देती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि किसी प्राचीन मंदिर को तोड़कर दरगाह का निर्माण कराया गया।पानी और झरनों की मौजूदगी
विष्णु गुप्ता का कहना है कि जहां-जहां शिव मंदिर स्थापित होते हैं, वहां पानी के स्त्रोत और झरने भी होते हैं। अजमेर दरगाह परिसर में भी ऐसे ही स्त्रोत मौजूद हैं, जिससे उनका दावा और मजबूत होता है।
पूजा अधिनियम और कानूनी पहलू
गुप्ता का कहना है कि अजमेर दरगाह Worship Act (पूजा अधिनियम) के दायरे में नहीं आती। उनका तर्क है कि यह अधिनियम केवल मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारों जैसे धार्मिक स्थलों पर लागू होता है, जबकि अजमेर दरगाह को कानून की नजर में “अथॉराइज्ड धार्मिक स्थल” के रूप में माना जाता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में भी इस विषय पर बहस हो चुकी है और उनके पास मजबूत सबूत और दलीलें हैं जिन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा।
ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला
विष्णु गुप्ता ने दावा किया है कि उनके पास पृथ्वीराज विजय के अलावा और भी प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि रिटायर्ड जज हरबिलास सारदा की 1911 में प्रकाशित किताब Ajmer: Historical and Descriptive में भी दरगाह परिसर में मंदिर के मलबे होने और गर्भगृह में जैन मंदिर के अवशेष मौजूद होने का उल्लेख किया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
अजमेर दरगाह से जुड़े इस विवाद की शुरुआत नवंबर 2024 में हुई थी। विष्णु गुप्ता ने 27 नवंबर 2024 को सिविल कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया और अल्पसंख्यक मंत्रालय, दरगाह कमेटी अजमेर और एएसआई को नोटिस जारी किया। इसके बाद दरगाह कमेटी, दरगाह दीवान गुलाम दस्तगीर अजमेर, ए. इमरान (बैंगलोर) और पंजाब निवासी राज जैन ने भी स्वयं को मामले का पक्षकार बनाने की अर्जी लगाई।
कोर्ट परिसर में सुरक्षा व्यवस्था
सुनवाई को देखते हुए प्रशासन सतर्क रहा। कोर्ट परिसर में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। अजमेर एसपी वंदिता राणा के निर्देश पर याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता को सुरक्षा भी मुहैया कराई गई।
आगे क्या?
अब इस विवाद की अगली सुनवाई 6 सितंबर को होगी। उस दिन दरगाह कमेटी की ओर से दायर प्रार्थना पत्र पर बहस होगी। अदालत यह तय करेगी कि गुप्ता की याचिका को खारिज किया जाए या फिर सुनवाई को आगे बढ़ाया जाए। यह मामला न केवल कानूनी बल्कि धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील है। अजमेर दरगाह देशभर के सूफी संतों और श्रद्धालुओं का प्रमुख धार्मिक स्थल है, ऐसे में मंदिर के दावे ने व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।