राजस्थान के ऐतिहासिक शहर जैसलमेर में तीन दिवसीय चादर महोत्सव का भव्य आगाज शुक्रवार को डेडानसर मैदान में हुआ। देशभर से हजारों श्रद्धालुओं और संतों की उपस्थिति में शुरू हुए इस महोत्सव ने पूरे शहर को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया। कार्यक्रम का आयोजन दादा गुरुदेव श्री जिनदत्तसुरि चादर महोत्सव समिति के तत्वावधान में किया जा रहा है। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरीश्वर महाराज का विशेष सानिध्य कार्यक्रम को प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम के पहले दिन धर्मसभा का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर से आए संतों, धर्माचार्यों और समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। समारोह के दौरान दादागुरु परंपरा से जुड़े विशेष सिक्के और डाक टिकट का भी विमोचन किया गया, जिसने इस आयोजन को और ऐतिहासिक बना दिया।
सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतीक है दादागुरु परंपरा
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक एकात्मता, सामाजिक सद्भाव और समरसता को मजबूत बनाने में दादागुरु परंपरा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि आज देशभर में सैकड़ों दादाबाड़ियां धार्मिक अनुष्ठानों, आध्यात्मिक चिंतन, साहित्य और संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।
कार्यक्रम से पहले मोहन भागवत ने जैसलमेर किले में स्थित पार्श्वनाथ जैन मंदिर में पहुंचकर दादा जिनदत्त सूरि की पवित्र चादर के दर्शन किए और पूजा-अर्चना की। इस दौरान उन्होंने मंदिर की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता के बारे में जानकारी भी ली।
युवाओं को संस्कार और सही दिशा देने की आवश्यकता
करीब 25 मिनट के अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने कहा कि आज के समय में युवाओं को सही दिशा और सन्मार्ग की प्रेरणा देना समाज की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है। उन्होंने कहा कि इस कार्य में संत समाज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। संतों के मार्गदर्शन से ही युवा पीढ़ी संस्कार, संयम और सदाचार के मार्ग पर चल सकती है।
उन्होंने कहा कि जैन दर्शन हमें यह संदेश देता है कि व्यक्ति जहां भी है, वहीं से आध्यात्मिक उन्नति की शुरुआत कर सकता है। ईश्वर तक पहुंचने के कई मार्ग हैं, लेकिन यदि श्रद्धा और विश्वास के साथ किसी एक मार्ग पर चला जाए तो अंततः भगवान का साक्षात्कार संभव है।
संतों की उपस्थिति से बढ़ी आयोजन की गरिमा
धर्मसभा को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरि ने कहा कि इस आयोजन में विभिन्न हिंदू संतों की उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा और भी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि आज जो भव्य आयोजन दिखाई दे रहा है, वह दादागुरु के श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और समर्पण का परिणाम है।
आचार्य ने कहा कि दादागुरु की शिक्षाएं समाज को संयम, करुणा और सेवा का संदेश देती हैं। उन्हीं के आशीर्वाद से यह महोत्सव इतने व्यापक स्तर पर आयोजित हो रहा है और दुनिया भर के श्रद्धालुओं को जोड़ रहा है।
महोत्सव में उमड़ा आस्था का सैलाब
धर्मसभा से पहले महोत्सव स्थल पर गच्छाधिपति, आचार्य, उपाध्याय, गणि और श्रमक-श्रमिणों का मंगल प्रवेश हुआ। इस दौरान लाभार्थी परिवारों ने नगर उद्घाटन किया और श्रद्धालुओं ने उत्साह के साथ उनका स्वागत किया।
महोत्सव समिति के चेयरमैन मंगल प्रभात लोढ़ा ने बताया कि पूरा जैसलमेर इस आध्यात्मिक आयोजन का साक्षी बन रहा है। उन्होंने कहा कि 7 मार्च को विश्वभर के विभिन्न नगरों में श्रद्धालु एक साथ दादागुरु इकतीसा पाठ करेंगे, जिससे सामूहिक आध्यात्मिक चेतना का संचार होगा।
अगले दो दिनों में होंगे कई विशेष कार्यक्रम
आयोजन समिति के सचिव पदम टाटिया ने बताया कि महोत्सव के दूसरे दिन शनिवार को जैसलमेर किले से भव्य चादर वरघोड़ा निकलेगा। इसके बाद विश्वभर में लगभग एक करोड़ आठ लाख श्रद्धालु दादागुरु इकतीसा का पाठ करेंगे। दोपहर में चादर अभिषेक और विशेष पूजा का आयोजन किया जाएगा, जबकि शाम को सांस्कृतिक संध्या में भक्ति संगीत की प्रस्तुतियां होंगी।
महोत्सव के अंतिम दिन 8 मार्च को विशिष्ट धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इस अवसर पर उपाध्याय महेन्द्रसागर महाराज को आचार्य पद प्रदान किया जाएगा और गणिनी पद समारोह भी संपन्न होगा। साथ ही चादर अभिषेक जल और वासक्षेप का वितरण श्रद्धालुओं के बीच किया जाएगा।


