शोभना शर्मा, अजमेर। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय (MDSU), अजमेर का त्रयोदश दीक्षांत समारोह गुरुवार को विश्वविद्यालय के सत्यार्थ सभागार में गरिमामय और भव्य वातावरण में आयोजित हुआ। समारोह की अध्यक्षता राजस्थान के राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे ने की। इस अवसर पर उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि दीक्षांत समारोह केवल उपाधि प्राप्त करने का अवसर नहीं, बल्कि जीवन में एक नए आरंभ का प्रतीक है। विद्यार्थियों का लक्ष्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके साथ बौद्धिक क्षमता, नैतिक मूल्यों और राष्ट्र के प्रति दायित्वबोध का विकास भी उतना ही आवश्यक है।
समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और विश्वविद्यालय गीत के साथ हुआ। कार्यक्रम में शिक्षा, शोध और भारतीय ज्ञान परंपरा की गरिमा स्पष्ट रूप से झलकती रही। राज्यपाल ने कहा कि दीक्षांत समारोह का समावर्तन संस्कार प्राचीन भारतीय परंपरा से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्यों को अंतिम उपदेश देते थे और उन्हें सत्य के मार्ग पर चलने, धर्म का आचरण करने तथा शिक्षा पर अहंकार नहीं करने की सीख देते थे। आज के आधुनिक शिक्षा तंत्र में भी इन मूल्यों की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है।
54 शोधार्थियों को पीएचडी, 40 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक
राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे ने विभिन्न संकायों के 54 शोधार्थियों को विद्या वाचस्पति पीएचडी की उपाधि प्रदान की। इसके साथ ही वर्ष 2020 से 2025 के मध्य उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन करने वाले दो विद्यार्थियों को कुलाधिपति पदक प्रदान किया गया। वहीं वर्ष 2023, 2024 और 2025 में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले 40 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया गया। पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के चेहरे पर आत्मविश्वास और भविष्य को लेकर नई ऊर्जा दिखाई दी।
अजमेर का ऐतिहासिक गौरव और दयानंद सरस्वती का संदेश
राज्यपाल बागडे ने अपने संबोधन में अजमेर के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि अजमेर का प्राचीन नाम अजयमेरु रहा है, जिसे चौहान शासक अजयराज ने बसाया था। यह नगर न केवल ऐतिहासिक बल्कि सांस्कृतिक और शैक्षणिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती को युगपुरुष बताते हुए कहा कि “वेदों की ओर लौटो” का उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने समय में था।
उन्होंने शिक्षा को व्यवहार से जोड़ने पर बल देते हुए कहा कि चरित्र निर्माण, आत्मविकास, ब्रह्मचर्य, योग और प्राणायाम जैसे मूल तत्व विद्यार्थियों के जीवन को संतुलित बनाते हैं। साथ ही वेद, उपनिषद, मातृभाषा और संस्कृत में अध्ययन करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा आधुनिक शिक्षा के साथ समन्वय बनाकर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाती है।
2047 के विकसित भारत के संकल्प में युवाओं की भूमिका
राज्यपाल ने कहा कि उपाधि प्राप्त विद्यार्थी राष्ट्र निर्माण में अपनी शिक्षा और ज्ञान का उपयोग करें। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्प का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र और विश्वगुरु बनाने में युवाओं की भूमिका निर्णायक होगी। विद्यार्थियों को राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ आगे बढ़ना चाहिए और अपने कार्य से समाज और देश को दिशा देनी चाहिए।
उन्होंने विश्वविद्यालय परिसरों में शोध और प्रयोगशालाओं की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि बौद्धिक विकास का वास्तविक प्रमाण व्यक्ति के कार्य और व्यक्तित्व से परिलक्षित होता है। केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि सोच, आचरण और योगदान से व्यक्ति की पहचान बनती है।
शारीरिक, नैतिक और पर्यावरणीय संतुलन का संदेश
राज्यपाल ने विद्यार्थियों को खेलकूद के माध्यम से शारीरिक रूप से सुदृढ़ बनने का संदेश दिया। उन्होंने नैतिकता को जीवन का आधार बताते हुए पर्यावरण संरक्षण पर भी विशेष जोर दिया। वृक्षारोपण और लगाए गए पौधों के संरक्षण को उन्होंने समाज और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक बताया। इसी अवसर पर उन्होंने बृहस्पति भवन के सामने स्थित दो उद्यानों का नामकरण “एक भारत श्रेष्ठ भारत विहार” और “संस्कृति विहार” करने की घोषणा की।
विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री के विचार
समारोह में विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि दीक्षांत समारोह वह क्षण होता है, जब विद्यार्थियों के सपनों को औपचारिक मान्यता मिलती है। शिक्षा ही मानव को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। उन्होंने तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक मूल्यों और संवेदनशीलता को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत ने कहा कि यह दीक्षांत समारोह भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा का गौरवशाली उदाहरण है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि उपाधि मंजिल नहीं, बल्कि उड़ान की शुरुआत है। बदलते समय में समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप नवाचार और अनुसंधान पर कार्य करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।


