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जल जीवन मिशन केस में महेश जोशी पर शिकंजा, राज्यपाल ने दी अभियोजन की मंजूरी

जल जीवन मिशन केस में महेश जोशी पर शिकंजा, राज्यपाल ने दी अभियोजन की मंजूरी

शोभना शर्मा।  राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। पूर्व कैबिनेट मंत्री महेश जोशी की मुश्किलें आने वाले समय में और बढ़ सकती हैं। राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने जल जीवन मिशन से जुड़े कथित घोटाले में महेश जोशी के खिलाफ अभियोजन चलाने की स्वीकृति दे दी है। यह मामला प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी PMLA–2002 के तहत दर्ज है और इसकी जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा की जा रही है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल की ओर से अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद अब ईडी के लिए अदालत में ट्रायल की राह आसान हो गई है। जांच एजेंसी का मानना है कि जल जीवन मिशन के दौरान महेश जोशी जलदाय मंत्री थे और इस परियोजना में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं में उनकी भूमिका संदिग्ध रही है। इसी आधार पर ईडी ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में पिछले वर्ष 24 अप्रैल को गिरफ्तार किया था।

जल जीवन मिशन केंद्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका उद्देश्य हर घर तक नल के माध्यम से स्वच्छ पेयजल पहुंचाना है। राजस्थान में इस योजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इस दौरान टेंडर प्रक्रिया, ठेकों के आवंटन और भुगतान में गंभीर अनियमितताएं हुईं। ईडी का दावा है कि इन अनियमितताओं के जरिए बड़ी मात्रा में अवैध धन अर्जित किया गया और उसे अलग-अलग माध्यमों से वैध दिखाने की कोशिश की गई।

ईडी की जांच के अनुसार, महेश जोशी उस समय जलदाय मंत्री होने के नाते विभागीय फैसलों में प्रभावशाली भूमिका में थे। एजेंसी का आरोप है कि कुछ कंपनियों और व्यक्तियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया, जिसके बदले में आर्थिक लाभ लिया गया। इसी आधार पर ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया और गिरफ्तारी की कार्रवाई की।

हालांकि, महेश जोशी और उनके वकील शुरू से ही ईडी के आरोपों को खारिज करते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जोशी के वकीलों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) में दर्ज मूल एफआईआर में महेश जोशी का नाम तक शामिल नहीं है। उनका तर्क था कि जब मूल भ्रष्टाचार के केस में ही उनका नाम नहीं है, तो मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप कैसे लगाया जा सकता है।

ईडी की ओर से यह आरोप लगाया गया था कि महेश जोशी ने करीब 2.01 करोड़ रुपये की अवैध राशि प्राप्त की। इस पर बचाव पक्ष ने कहा कि एजेंसी के पास इस आरोप को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट में यह भी दलील दी गई कि ईडी महेश जोशी के बेटे की फर्म में 50 लाख रुपये के लेनदेन को रिश्वत से जोड़कर देख रही है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।

महेश जोशी के वकीलों ने अदालत को बताया था कि यह 50 लाख रुपये की राशि लोन के रूप में ली गई थी और बाद में इसे पूरी तरह वापस भी कर दिया गया। उनका कहना था कि अगर यह रकम रिश्वत होती, तो उसे लौटाने का कोई औचित्य नहीं था। यह लेनदेन अपने आप में यह साबित करता है कि मामला व्यावसायिक लेनदेन का है, न कि भ्रष्टाचार का।

इन सभी दलीलों के बावजूद, राज्यपाल द्वारा अभियोजन की मंजूरी दिए जाने को ईडी के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि अब यह मामला न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में प्रवेश करेगा। अभियोजन स्वीकृति के बाद विशेष अदालत में ट्रायल की कार्रवाई तेज होने की संभावना है।

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