राजस्थान में चल रहा खेजड़ी बचाओ आंदोलन अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। बीकानेर जिले के कलेक्ट्रेट परिसर में चार दिनों से आंदोलित संतों, पर्यावरण प्रेमियों और बिश्नोई समाज के प्रतिनिधियों के महापड़ाव के बीच आखिरकार सरकार ने नरमी दिखाते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाया है। गुरुवार को प्रदेश सरकार के मंत्री केके विश्नोई मंच पर पहुंचे और घोषणा की कि सरकार आंदोलनकारियों की मांगों पर लिखित आश्वासन देगी। यह कदम इस लंबे विवाद में सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
सरकार का बड़ा कदम — “लिखित में देंगे आश्वासन”
मंत्री केके विश्नोई ने घोषणा करते हुए कहा कि प्रदेश सरकार खेजड़ी संरक्षण के मुद्दे पर पूरी तरह गंभीर है। उन्होंने कहा कि आंदोलनकारियों की मांगों को संवेदनशीलता से सुना गया है और सरकार पर्यावरण संरक्षण और बिश्नोई समाज की भावनाओं का सम्मान करती है। केके विश्नोई ने मंच से स्पष्ट कहा— “सरकार खेजड़ी संरक्षण के लिए लिखित आश्वासन देगी, ताकि भविष्य में इस वृक्ष की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।” सरकार की यह घोषणा आंदोलन के लिए एक बड़ी नैतिक जीत मानी जा रही है। कई दिनों से आंदोलनकारी ‘ट्री एक्ट’ जैसे सख्त कानून की मांग पर अडिग थे और लिखित वादा मिलने तक पीछे हटने को तैयार नहीं थे।
अमृता देवी बिश्नोई की विरासत का सम्मान
अपने संबोधन में मंत्री विश्नोई ने बिश्नोई समाज की ऐतिहासिक परंपरा और पर्यावरण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राज्य और केंद्र सरकार दोनों ही अमृता देवी बिश्नोई के योगदान और बलिदान को गर्व से याद करते हैं। उन्होंने कहा— “हम मां अमृता देवी की पर्यावरण रक्षा की विरासत को कभी झुकने नहीं देंगे।” विश्नोई समाज, जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति विश्वभर में अपनी पहचान रखता है, इस आंदोलन को केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर की रक्षा का प्रतीक मान रहा है।
अनशन खत्म होने की संभावनाएँ बढ़ीं
सरकार की घोषणा के बाद आंदोलन स्थल पर चर्चा तेज हो गई है कि अनशन जल्द खत्म हो सकता है। हालाँकि, आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कहा है कि लिखित आश्वासन मिलने तक महापड़ाव जारी रहेगा। अनशन पर बैठे कई संत और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि अब सरकार के कदम को सकारात्मक मान रहे हैं और उम्मीद जता रहे हैं कि यह संघर्ष सार्थक परिणाम देगा।
सोलर प्रोजेक्ट्स के कारण बढ़ा विवाद
खेजड़ी बचाओ आंदोलन की जड़ें पश्चिमी राजस्थान में तेजी से लग रहे सोलर पावर प्रोजेक्ट्स से जुड़ी हैं। खेजड़ी, जिसे राजस्थान का राजकीय वृक्ष घोषित किया गया है, पर्यावरण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पेड़ को ‘मरुस्थल की जीवनरेखा’ तक कहा जाता है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि बीकानेर संभाग में बड़े स्तर पर सोलर कंपनियों ने विकास के नाम पर खेजड़ी के पेड़ों की अवैध कटाई की है। यह भी कहा गया कि कई जगहों पर कटे हुए पेड़ों को रात के समय जमीन में दबाने तक की घटनाएँ सामने आई हैं। इन आरोपों ने बिश्नोई समाज और पर्यावरण प्रेमियों के धैर्य को तोड़ दिया और आंदोलन का रूप तीखा हुआ।
मामूली जुर्माना: आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी चिंता
खेजड़ी संरक्षण कानूनों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि अवैध कटाई पर मात्र 1000 रुपये का जुर्माना है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इतनी कम सजा होने से अपराधी बिना डर के पेड़ काटते हैं और जुर्माना भरकर आसानी से छूट जाते हैं। इसी कारण संतों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की प्रमुख मांगें हैं—
खेजड़ी की अवैध कटाई को गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखा जाए
पेड़ काटने वालों पर सख्त कार्रवाई हो
खेजड़ी को धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा मिले
एक विशेष और कड़ा Tree Act बनाया जाए
सोलर कंपनियों की मनमानी पर नियंत्रण हो
आंदोलनकारी ‘सिर्फ आश्वासन नहीं, ठोस कानून’ की मांग कर रहे हैं।
363 शहीदों की प्रेरणा और अनशन की गंभीरता
इस आंदोलन की भावनात्मक जड़ें 1730 ईस्वी के प्रसिद्ध खेजड़ली बलिदान से जुड़ी हैं। ऐतिहासिक रूप से, इस घटना में बिश्नोई समाज के कई लोगों ने पर्यावरण बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित किया था। यह परंपरा आज भी समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है। इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए बीकानेर में वर्तमान आंदोलन में—
480 से अधिक लोग
जिनमें 29 संत और 60 महिलाएँ शामिल हैं
— 3 फरवरी से अनशन पर बैठे हुए हैं।
संतों द्वारा सरकार को दिए गए 24 घंटे के अल्टीमेटम के बाद ही प्रशासनिक स्तर पर हलचल शुरू हुई और मंत्रियों का प्रतिनिधिमंडल वार्ता के लिए पहुंचा।
गतिरोध टूटा — समाधान की ओर बढ़ रहा आंदोलन
सरकारी घोषणा ने आंदोलन में नई ऊर्जा भर दी है। कई आंदोलनकारियों ने कहा कि यदि सरकार लिखित रूप में सख्त कदम उठाने का भरोसा देती है, तो यह खेजड़ी संरक्षण के लिए ऐतिहासिक फैसला होगा। बीकानेर कलेक्ट्रेट पर चल रहा यह महापड़ाव अब उस मोड़ पर पहुंच चुका है जहां दोनों पक्ष समाधान की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। पर्यावरण प्रेमियों, संतों और बिश्नोई समाज को उम्मीद है कि सरकार की लिखित गारंटी भविष्य में खेजड़ी वृक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।


