शोभना शर्मा। सीकर सहित पूरे शेखावटी अंचल में कड़ाके की ठंड का असर अब केवल आम जनजीवन तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका प्रभाव मंदिरों और देवी-देवताओं की सेवा-श्रृंगार पर भी साफ नजर आने लगा है। सर्द हवाओं और गिरते तापमान के बीच भक्त और पुजारी अपने आराध्य देव को सर्दी से बचाने के लिए विशेष इंतजाम कर रहे हैं। मंदिरों में भगवान की प्रतिमाओं को ऊनी वस्त्र पहनाए जा रहे हैं, शॉल और रजाई ओढ़ाई जा रही है और ठंड से राहत के लिए हीटर तक लगाए गए हैं।
भगवान को पहनाए गए स्वेटर, शॉल और रजाई
सीकर शहर के प्राचीन श्री कल्याण धाम और प्राचीन राधा दामोदर मंदिर सहित कई ठाकुर जी के मंदिरों में भगवान की मूर्तियों को स्वेटर पहनाए गए हैं। इसके साथ ही ठंड से बचाव के लिए शॉल और रजाई ओढ़ाने की परंपरा निभाई जा रही है। मंदिरों में सुबह और शाम के श्रृंगार के दौरान सर्दी को ध्यान में रखते हुए विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं, ताकि भगवान को ठंड का अहसास न हो।
ठंड से बचाव के लिए हीटर की व्यवस्था
कड़ाके की ठंड को देखते हुए कई मंदिरों में भगवान की प्रतिमाओं के पास हीटर भी लगाए गए हैं। पुजारियों का कहना है कि जैसे इंसानों को सर्दी से बचाव की जरूरत होती है, वैसे ही भगवान की सेवा में भी यह भावना रखी जाती है। ठंड के मौसम में मंदिरों में वातावरण को गर्म रखने के लिए अतिरिक्त उपाय किए जा रहे हैं, ताकि पूजा-अर्चना के समय किसी तरह की असुविधा न हो।
प्रदूषण बढ़ा तो भगवान को पहनाए मास्क
शेखावटी अंचल में ठंड के साथ-साथ वायु प्रदूषण भी तेजी से बढ़ा है। प्रदूषण से बचाने के लिए कई मंदिरों में भगवान की प्रतिमाओं को मास्क पहनाए जाने लगे हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि बढ़ते प्रदूषण का असर हर किसी पर पड़ता है, इसलिए भावनात्मक जुड़ाव के तहत भगवान को भी प्रदूषण से सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है।
वायु गुणवत्ता सूचकांक की बात करें तो भिवाड़ी में एयर क्वालिटी इंडेक्स 294 तक पहुंच गया है, जो बेहद खराब श्रेणी में आता है। अलवर में 231, चूरू में 284, दौसा में 233 और श्रीगंगानगर में 271 दर्ज किया गया है। वहीं कोटा में 180, सीकर में 196, टोंक में 186, उदयपुर में 157, माउंट आबू में 158 और अजमेर में 143 का स्तर रिकॉर्ड हुआ है।
भगवान को लगाया जा रहा गर्म भोग
सर्दी के मौसम में मंदिरों में भगवान के भोग में भी बदलाव किया गया है। ठंड से बचाव और स्वास्थ्य की दृष्टि से भगवान को गुड़, तिल के लड्डू, बाजरे की खिचड़ी, गजक, रेवड़ी और केसर युक्त गर्म दूध का भोग अर्पित किया जा रहा है। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है, जिसे श्रद्धालु पूरी आस्था और भक्ति के साथ निभाते हैं।
भक्तों की मान्यता और सेवा भाव
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि जैसे मनुष्य को सर्दी लगती है, वैसे ही भगवान की प्रतिमाओं को भी सर्दी का अहसास होता है। इसी भावना के साथ भक्त भगवान के श्रृंगार और भोग में विशेष ध्यान रखते हैं। यह परंपरा भक्त और भगवान के बीच गहरे भावनात्मक जुड़ाव और सेवा भाव को दर्शाती है।
पुजारियों ने बताई परंपरा की अहमियत
सीकर के प्राचीन राधा दामोदर मंदिर के पुजारी नंदकिशोर शर्मा ने बताया कि अंचल में ठंड बढ़ते ही भगवान की प्रतिमाओं को ऊनी वस्त्र पहनाए जाते हैं और गर्म तासीर वाले भोग लगाए जाते हैं। वहीं प्राचीन श्री कल्याण जी मंदिर के पुजारी बनवारी लाल के अनुसार, कड़ाके की ठंड शुरू होते ही भगवान की सेवा में शॉल, रजाई, हीटर और गर्म भोग की व्यवस्था की जाती है। उनका कहना है कि यह परंपरा आस्था, श्रद्धा और सेवा भाव का प्रतीक है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।


