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नए साल पर गिग वर्कर्स हड़ताल: जयपुर में फूड और ग्रोसरी डिलीवरी पर असर

नए साल पर गिग वर्कर्स हड़ताल: जयपुर में फूड और ग्रोसरी डिलीवरी पर असर

मनीषा शर्मा ।  नए साल के जश्न के बीच, देशभर के करोड़ों लोगों के डिनर और स्नैक्स प्लान अचानक प्रभावित हो गए। 31 दिसंबर की शाम से लाखों गिग वर्कर्स ने एक साथ हड़ताल का ऐलान कर दिया, जिसके चलते जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट, जेप्टो और अमेजन जैसी बड़ी कंपनियों की सेवाएं लड़खड़ा गईं। राजस्थान की राजधानी जयपुर में भी इसका असर साफ दिखाई देने लगा है। कई इलाकों में ऑर्डर स्वीकार नहीं किए जा रहे, जबकि कुछ क्षेत्रों में “डिले” नोटिफिकेशन लगातार मिल रहे हैं। यह आंदोलन केवल डिलीवरी रुकने भर का मामला नहीं, बल्कि उन सवालों का प्रतीक बन चुका है, जो लंबे समय से इन वर्कर्स के भीतर दबे हुए थे—काम का दबाव, सुरक्षा की अनदेखी और कम पारिश्रमिक।

क्यों थमे डिलीवरी के पहिए?

गिग वर्कर्स का कहना है कि कंपनियों की “10 मिनट डिलीवरी” नीति ने उनकी जिंदगी कठोर बना दी है। जयपुर के कई डिलीवरी पार्टनर्स का कहना है कि इस समय सीमा को पूरा करने के लिए उन्हें तेज रफ्तार में वाहन चलाने पड़ते हैं, ट्रैफिक नियम तोड़ने का जोखिम उठाना पड़ता है और दुर्घटनाओं का डर हमेशा बना रहता है। उनका आरोप है कि जरा सी देरी पर भारी पेनल्टी काट ली जाती है, जबकि मौसम, ट्रैफिक या रेस्टोरेंट देरी जैसी परिस्थितियों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। वर्कर्स की प्रमुख मांगें हैं—

  • 10 मिनट डिलीवरी नीति को तुरंत समाप्त किया जाए।

  • न्यूनतम भुगतान 20 रुपये प्रति किलोमीटर तय किया जाए।

  • काम के दौरान सामाजिक सुरक्षा और दुर्घटना बीमा दिया जाए।

  • अन्यायपूर्ण पेनल्टी सिस्टम में सुधार लाया जाए।

वर्कर्स का कहना है कि कंपनियां मुनाफा बढ़ाने के नाम पर उनके श्रम और सुरक्षा दोनों से समझौता कर रही हैं।

राजनीतिक मोर्चा भी गर्माया

इस हड़ताल को राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने गिग वर्कर्स के साथ खुलकर खड़े होते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला। उनका कहना है कि पिछली सरकार ने गिग वर्कर्स के लिए विशेष कानून बनाकर देश में मिसाल पेश की थी, मगर वर्तमान सरकार इसे लागू करने में नाकाम साबित हुई है। जूली ने आरोप लगाया कि बजट में किए गए वादे केवल कागजों तक सीमित रह गए और मजदूरों को राहत नहीं मिल सकी। उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखे अपने पत्र का जिक्र करते हुए कहा कि गिग वर्कर्स देश की नई अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं, इसलिए उनकी सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है।

जयपुर में आंशिक असर, रात को बढ़ सकती है परेशानी

जयपुर में दोपहर होते-होते कई डिलीवरी पार्टनर्स ने अपने ऐप बंद कर दिए। संगठनों के संदेश मिलते ही अन्य वर्कर्स भी हड़ताल में शामिल होने लगे। परिणामस्वरूप, कई रेस्टोरेंट और स्टोर ऑर्डर स्वीकार करने में असमर्थ हो गए। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ही रात की पार्टियां और नए साल के सेलिब्रेशन शुरू होंगे, स्थिति और गंभीर हो सकती है। फूड और ग्रोसरी ऐप्स पर “नॉट अवेलेबल” या “सर्विसेज डिले” जैसी चेतावनियां आम हो जाएंगी। कई परिवारों ने पहले ही वैकल्पिक इंतजाम करने शुरू कर दिए हैं—या तो पहले से कुकिंग कर ली गई है, या फिर होटल-रेस्तरां में जाने की योजना बन रही है।

कंपनियां और प्रशासन क्या कह रहे हैं?

कंपनियों का कहना है कि वे बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, कई वर्कर्स का मानना है कि बिना ठोस आश्वासन आंदोलन खत्म करना उनके साथ अन्याय होगा। प्रशासन भी स्थिति पर नजर रखे हुए है। स्थानीय पुलिस और श्रम विभाग के अधिकारी बीच का रास्ता निकालने में जुटे हैं, ताकि न तो आम जनता को असुविधा हो और न ही वर्कर्स के हक प्रभावित हों।

गिग इकॉनमी पर बड़ा सवाल

यह हड़ताल एक बड़े प्रश्न की ओर संकेत करती है—क्या तेज डिलीवरी के नाम पर गिग वर्कर्स की सुरक्षा और सम्मान की अनदेखी सही है? डिलीवरी प्लेटफॉर्म आज शहरी जीवन की जरूरत बन चुके हैं। लेकिन यदि काम करने वालों को उचित वेतन, बीमा और सुरक्षित वातावरण नहीं मिलेगा, तो यह मॉडल टिकाऊ नहीं रह पाएगा। जयपुर सहित पूरे देश में लोग यह देख रहे हैं कि नए साल के जश्न के बीच एक नया विमर्श जन्म ले रहा है—सुविधा बनाम इंसानी मेहनत की कीमत।

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