इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता से जुड़े मामले में दिए गए आदेश ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस फैसले के बाद राजस्थान की राजनीति में भी तेज प्रतिक्रिया देखने को मिली है, जहां पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने इसे न केवल बेबुनियाद बताया, बल्कि न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित एजेंसियों को एफआईआर दर्ज करने और जांच की संभावना पर विचार करने के निर्देश दिए हैं। यह याचिका कर्नाटक के एक भाजपा कार्यकर्ता द्वारा दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी ने एक ब्रिटिश कंपनी के दस्तावेजों में खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए जांच के निर्देश दिए, जिसके बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया के माध्यम से विस्तृत बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर पहले भी इसी प्रकार की याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं, जिन्हें अदालतों ने खारिज कर दिया था। गहलोत के अनुसार, वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा इस मुद्दे को निराधार माना गया था, वहीं जुलाई 2025 में भी हाईकोर्ट ने इसी तरह की याचिका को खारिज किया था। ऐसे में अब दोबारा इसी मुद्दे पर जांच के आदेश देना उन्हें असंगत और अनावश्यक प्रतीत होता है।
गहलोत ने अपने बयान में यह भी कहा कि इस प्रकार के फैसले न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि बार-बार एक ही मुद्दे पर जांच के आदेश देना न केवल प्रशासनिक तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डालता है, बल्कि न्यायपालिका के समय और संसाधनों का भी अनावश्यक उपयोग करता है। उनके अनुसार, यदि पहले ही इस मामले में स्पष्टता आ चुकी है, तो दोबारा उसी दिशा में कदम उठाना उचित नहीं कहा जा सकता।
पूर्व मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे को भावनात्मक और ऐतिहासिक संदर्भों से भी जोड़ा। उन्होंने राहुल गांधी के परिवार के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके पिता राजीव गांधी और दादी इंदिरा गांधी ने देश की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। ऐसे परिवार के सदस्य पर इस तरह के आरोप लगाना और कार्रवाई करना उन्हें अनुचित प्रतीत होता है।
गहलोत ने राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने देशभर में सामाजिक सद्भाव और एकता का संदेश देने का प्रयास किया था। उनके अनुसार, जो व्यक्ति देश में भाईचारे और प्रेम का वातावरण बनाने के लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा करता है, उसके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
इस मामले के सामने आने के बाद राजस्थान में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच भी हलचल तेज हो गई है। गहलोत के बयान के बाद पार्टी के भीतर एकजुटता दिखाई दे रही है और कार्यकर्ता इस मुद्दे को लेकर सक्रिय होते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर सकती है और इसे जनभावनाओं से जोड़कर प्रस्तुत कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, राजस्थान में यह मामला केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में यह एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभर सकता है। गहलोत का आक्रामक रुख यह संकेत देता है कि कांग्रेस इस विषय को केवल अदालतों तक सीमित रखने के बजाय राजनीतिक मंचों पर भी उठाएगी।
दूसरी ओर, विपक्षी दल इस मामले को गंभीर आरोपों से जोड़ते हुए जांच की मांग को उचित ठहरा रहे हैं। इस कारण यह मुद्दा आने वाले समय में और अधिक तूल पकड़ सकता है, जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ जनता के बीच जाएंगे।


