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महिला आरक्षण बिल पर गहलोत का मोदी-शाह पर बड़ा हमला

महिला आरक्षण बिल पर गहलोत का मोदी-शाह पर बड़ा हमला

लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पारित न होने के बाद देश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। भारतीय जनता पार्टी की ओर से बिल गिरने के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, वहीं कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जयपुर में मीडिया से बातचीत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर सीधा हमला बोला। गहलोत ने कहा कि जो कुछ हुआ, वह भाजपा नेतृत्व की इच्छा के अनुसार ही हुआ है और सरकार वास्तव में यह बिल पास कराना ही नहीं चाहती थी।

अशोक गहलोत ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह महिला आरक्षण बिल को लेकर गंभीर होते, तो वे पहले से विपक्षी दलों के साथ संवाद स्थापित करते। इतना बड़ा संवैधानिक विषय बिना व्यापक सहमति के पारित नहीं हो सकता था। सरकार को यह अच्छी तरह पता था कि बिल को पारित कराने के लिए विपक्ष का सहयोग जरूरी है, क्योंकि संवैधानिक संशोधन के लिए सदन में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद विपक्ष को विश्वास में लेने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई।

उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया, जिससे बिल पास न हो सके और बाद में इसका दोष विपक्ष पर डाला जा सके। गहलोत ने कहा कि यह पूरी रणनीति पहले से तय थी। भाजपा अब जनता के सामने यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि उसने महिलाओं को आरक्षण देने की कोशिश की, लेकिन विपक्ष ने रोड़ा अटका दिया। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले से पारित महिला आरक्षण कानून को रोकने के लिए एनडीए सरकार की तरफ से नया विधेयक लाया गया, जो अंततः एक राजनीतिक षड्यंत्र साबित हुआ है। उनके अनुसार सरकार को पहले दिन से पता था कि संसद में संख्या बल पर्याप्त नहीं है, फिर भी विपक्ष से खुलकर बातचीत नहीं की गई। अगर सरकार की मंशा साफ होती, तो सर्वदलीय बैठक बुलाई जाती और सभी दलों की राय लेकर आगे बढ़ा जाता।

गहलोत ने कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे लगातार सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इतने संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व के विषय पर प्रधानमंत्री को सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर बुलाकर चर्चा करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके बजाय अलग-अलग दलों से अलग-अलग बातचीत कर विपक्ष में मतभेद पैदा करने की कोशिश की गई।

उन्होंने यह भी कहा कि दक्षिण भारत के कई राज्यों और पश्चिम बंगाल ने परिसीमन को लेकर अपनी आशंकाएं पहले ही जताई थीं। ऐसे में केंद्र सरकार को संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बुलाकर भरोसा देना चाहिए था कि परिसीमन निष्पक्ष और संतुलित तरीके से होगा। यदि ऐसा किया जाता, तो राजनीतिक विश्वास का माहौल बनता और बिल को लेकर सकारात्मक सहमति बन सकती थी। लेकिन सरकार ने ऐसा करने के बजाय टकराव का रास्ता चुना।

अशोक गहलोत ने महिला आरक्षण बिल को परिसीमन से जोड़ने पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह विधेयक केवल महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का मुद्दा नहीं था, बल्कि इसके पीछे पूरे देश में राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिश छिपी हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार अपने हिसाब से लोकसभा क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करना चाहती थी, ताकि उसे चुनावी लाभ मिल सके।

उन्होंने असम और जम्मू-कश्मीर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां परिसीमन प्रक्रिया पर विपक्षी दल पहले ही सवाल उठा चुके हैं। गहलोत के मुताबिक जिन राज्यों में परिसीमन हुआ, वहां विपक्ष ने आरोप लगाया कि सीमांकन राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर किया गया। ऐसे में यदि यही मॉडल पूरे देश में लागू किया जाता, तो कई राज्यों और दलों को नुकसान हो सकता था। यही कारण है कि विपक्ष ने इस पर आपत्ति जताई।

गहलोत ने कहा कि भाजपा विधानसभा चुनावों के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहती थी। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश के कई राज्यों में चुनाव चल रहे थे, तब इतनी जल्दबाजी में संसद सत्र बुलाने की क्या जरूरत थी। विपक्ष लगातार मांग कर रहा था कि 29 अप्रैल को मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद सत्र बुलाया जाए, ताकि सभी दल गंभीरता से चर्चा कर सकें। लेकिन सरकार ने यह सुझाव नहीं माना।

उनके अनुसार इससे साफ है कि सरकार खुद नहीं चाहती थी कि बिल पारित हो। यदि सत्र चुनावों के बाद बुलाया जाता, तो ज्यादा सांसद उपस्थित रहते, दलों के बीच बातचीत होती और व्यापक सहमति बनने की संभावना भी बढ़ती। लेकिन सरकार ने जल्दबाजी दिखाकर ऐसी परिस्थितियां बनाई, जिससे बिल गिर जाए और उसका राजनीतिक लाभ उठाया जा सके।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा अब विपक्ष को महिलाओं के अधिकारों का विरोधी बताने की कोशिश करेगी, लेकिन देश की जनता सब समझती है। उन्होंने दावा किया कि जनता जानती है कि सरकार ने इस मुद्दे का इस्तेमाल चुनावी एजेंडा बनाने के लिए किया। महिलाओं को वास्तविक प्रतिनिधित्व देने की नीयत होती, तो पहले सहमति बनाई जाती, संवाद होता और संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान किया जाता।

महिला आरक्षण बिल पर छिड़ा यह विवाद आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। एक तरफ भाजपा इसे महिला सशक्तिकरण का बड़ा कदम बताकर विपक्ष पर हमला कर रही है, वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। अशोक गहलोत के बयान ने इस बहस को और गर्म कर दिया है। अब यह मुद्दा संसद से निकलकर चुनावी मैदान तक पहुंच चुका है, जहां जनता तय करेगी कि किस पक्ष की दलील ज्यादा मजबूत है।

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