राजस्थान में गणगौर का पर्व इस बार भी पूरे शाही ठाठ-बाट और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। Jaipur, Jodhpur, Udaipur, Alwar और अन्य जिलों में गणगौर माता की भव्य सवारी निकाली गई। इस दौरान लोक संस्कृति, आस्था और परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। सड़कों पर हजारों लोगों की भीड़ उमड़ी और जगह-जगह सवारी का भव्य स्वागत किया गया।
जयपुर में शाही अंदाज और लोक संस्कृति का संगम
राजधानी जयपुर में त्रिपोलिया गेट से गणगौर माता की सवारी रवाना हुई, जहां पारंपरिक विधि-विधान से आरती उतारी गई। इस बार पूर्व राजपरिवार के पुरोहित द्वारा आरती संपन्न कराई गई, जिससे आयोजन का महत्व और बढ़ गया। सवारी के दौरान प्रदेशभर से आए करीब 210 लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से माहौल को जीवंत बना दिया।
कच्छी घोड़ी, कालबेलिया, घूमर, गेर और चरी जैसे लोकनृत्यों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सवारी के ऊपर ड्रोन के माध्यम से पुष्पवर्षा की गई, जो आधुनिक तकनीक और परंपरा का अनूठा संगम नजर आया। बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटक भी इस आयोजन को देखने पहुंचे।
जोधपुर में 2 करोड़ की ज्वेलरी से सजी गणगौर माता
Jodhpur में गणगौर का उत्सव विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र रहा, जहां गवर माता को लगभग 2 करोड़ रुपये की ज्वेलरी से सजाया गया। यह सवारी शहर के विभिन्न प्रमुख बाजारों और मार्गों से होकर निकली और अंत में ऐतिहासिक घंटाघर पर संपन्न हुई।
इस दौरान शोभायात्रा में पारंपरिक बैंड, लोक कलाकार और धार्मिक झांकियां शामिल रहीं। स्थानीय लोगों ने पूरे मार्ग में सवारी का स्वागत किया और आस्था का प्रदर्शन किया। यह आयोजन न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान को भी दर्शाता है।
उदयपुर में झील में नाव पर निकली शाही सवारी
Udaipur में गणगौर उत्सव का दृश्य बेहद आकर्षक और अनूठा रहा। यहां शाही गणगौर सवारी बंशीघाट से रवाना होकर Lake Pichola में नाव के जरिए गणगौर घाट तक पहुंची। झील में सजी शाही नावों और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों ने इस आयोजन को और भी भव्य बना दिया।
गणगौर घाट पर कसूंबा (जल अर्पण) की परंपरा निभाई गई। इस दौरान विभिन्न समाजों की महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजी-धजी गणगौर की प्रतिमाएं लेकर घाट पर पहुंचीं। लोक कलाकारों ने नावों पर ही नृत्य प्रस्तुत कर माहौल को जीवंत बनाए रखा। इस आयोजन को देखने के लिए विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में पहुंचे, जिन्हें विशेष नावों के माध्यम से यह दृश्य दिखाया गया।
अलवर में रियासतकालीन परंपरा और गार्ड ऑफ ऑनर
Alwar में गणगौर की सवारी रियासतकालीन परंपराओं के अनुरूप निकाली गई। गणगौर माता को पालकी में विराजमान कर मंशा मार्ग होते हुए सागर तक ले जाया गया। इस दौरान सवारी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया, जो इस आयोजन की विशेष पहचान रही।
सवारी के साथ पारंपरिक वाद्य यंत्र, लोक कलाकार और श्रद्धालुओं की भीड़ शामिल रही। आयोजन ने शहर में धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण को और अधिक सशक्त बनाया।
भरतपुर और कोटा में भी विशेष आयोजन
Bharatpur में गणगौर माता को डेढ़ करोड़ रुपये के सोने के आभूषणों से सजाकर शोभायात्रा निकाली गई। सुरक्षा के लिहाज से हथियारबंद पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। यह परंपरा पिछले 100 वर्षों से लगातार चली आ रही है, जो शहर की सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाती है।
वहीं Kota में जीनगर समाज द्वारा गणगौर शोभायात्रा निकाली गई। यहां एक अनोखी परंपरा के तहत ईसर-गणगौर की प्रतिमा को सिर पर धारण करने के लिए बोली लगाई जाती है। इस बार 25 हजार रुपये की सबसे बड़ी बोली मदनमोहन परिहार परिवार द्वारा लगाई गई, जिसे समाज के विकास कार्यों में उपयोग किया जाएगा।
सीकर और अन्य जिलों में भी परंपरा की झलक
Sikar में रघुनाथ मंदिर से गणगौर की सवारी निकाली गई, जहां गौर-ईशर को लाल वस्त्रों और आभूषणों से सजाया गया। यह परंपरा 339 वर्षों से चली आ रही है, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती है।
सवारी के दौरान लोग श्रद्धा के साथ धोक लगाते नजर आए और जगह-जगह पुष्पवर्षा से स्वागत किया गया। स्थानीय समुदाय की भागीदारी ने इस आयोजन को और भी भव्य बना दिया।
परंपरा और आधुनिकता का अनूठा संगम
इस वर्ष गणगौर सवारी को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से भी जोड़ा गया। राजस्थान फाउंडेशन और पर्यटन विभाग द्वारा इस आयोजन का लाइव प्रसारण किया गया, जिससे विदेशों में बसे राजस्थानी समुदाय भी इस सांस्कृतिक उत्सव से जुड़ सके।
जयपुर में ड्रोन और हेलिकॉप्टर के माध्यम से पुष्पवर्षा जैसे आधुनिक प्रयोगों ने पारंपरिक आयोजन को नया आयाम दिया। वहीं उदयपुर में ‘दातन हेला’ और ‘भूत’ की झांकी जैसी पारंपरिक गतिविधियों ने इस उत्सव की सांस्कृतिक गहराई को बनाए रखा।
सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक
गणगौर का यह उत्सव राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक है। विभिन्न शहरों में निकली शाही सवारी ने यह साबित किया कि आधुनिकता के दौर में भी पारंपरिक त्योहारों का महत्व कम नहीं हुआ है।


