राजस्थान की समृद्ध लोक कला और लोक संगीत परंपरा के लिए यह वर्ष ऐतिहासिक साबित हो रहा है। देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल पद्म श्री से इस बार राजस्थान के दो ऐसे लोक कलाकारों को सम्मानित किया जा रहा है, जिन्होंने जीवनभर की साधना से विलुप्त होती लोक विधाओं को न केवल संरक्षित किया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। भरतपुर जिले के डीग निवासी गफरुद्दीन मेवाती जोगी और जैसलमेर जिले के आदिवासी कलाकार तगा राम भील को लोक कला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए यह सम्मान प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि राजस्थान की पूरी लोक सांस्कृतिक परंपरा का गौरव है।
गफरुद्दीन मेवाती जोगी: मेवाती लोक संगीत के जीवंत प्रतीक
भरतपुर जिले के डीग क्षेत्र से आने वाले गफरुद्दीन मेवाती जोगी पिछले 60 वर्षों से अधिक समय से मेवाती लोक संगीत की साधना कर रहे हैं। विशेष रूप से मेवात अंचल की दुर्लभ लोक विधा ‘पांडुन का कड़ा’ और पारंपरिक वाद्य भपंग को जीवित रखने में उनका योगदान अद्वितीय माना जाता है। गफरुद्दीन मेवाती जोगी को ‘पांडुन का कड़ा’ का एकमात्र जीवित ढाणी शैली कलाकार माना जाता है, जो महाभारत पर आधारित लगभग 2500 दोहों का गायन करते हैं। उनकी प्रस्तुतियों में लोक कथाएं, इतिहास, वीर गाथाएं और मेवाती समाज की सांस्कृतिक चेतना स्पष्ट रूप से झलकती है।
12 से अधिक पारंपरिक वाद्य यंत्रों में पारंगत
भपंग वादन के साथ-साथ गफरुद्दीन मेवाती जोगी अलगोजा, चिकारा, जोगी सारंगी सहित लगभग 12 पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों में निपुण हैं। उनकी कला केवल गायन या वादन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मेवाती लोक जीवन की संपूर्ण अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती है। उनकी साधना ने लोक संगीत को मनोरंजन के दायरे से निकालकर सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित किया है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की लोक परंपरा की पहचान
गफरुद्दीन मेवाती जोगी ने अपनी लोक कला की प्रस्तुति लंदन, पेरिस, कनाडा और फ्रांस सहित कई देशों में दी है। वे इंग्लैंड की महारानी के समक्ष भी अपनी कला प्रस्तुत कर चुके हैं, जो किसी भी लोक कलाकार के लिए असाधारण उपलब्धि मानी जाती है। पद्म श्री से पहले उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है, जो उनकी कला साधना की राष्ट्रीय मान्यता को दर्शाता है।
तगा राम भील: आदिवासी लोक संगीत की मजबूत आवाज
जैसलमेर जिले के मूल सागर क्षेत्र के पास रहने वाले तगा राम भील भी इस वर्ष पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किए जाएंगे। भील समुदाय से आने वाले तगा राम भील राजस्थान के प्रसिद्ध अलगोजा वादक हैं और आदिवासी लोक संगीत परंपरा के सशक्त प्रतिनिधि माने जाते हैं। उन्होंने बचपन से ही अलगोजा वादन सीखकर लोक संगीत को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। बीते तीन दशकों से अधिक समय से वे इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं।
वाद्य निर्माण से लेकर वैश्विक मंच तक
तगा राम भील केवल कलाकार ही नहीं, बल्कि पारंपरिक वाद्यों के कुशल निर्माता भी हैं। वे स्वयं अलगोजा का निर्माण करते हैं और देश-विदेश से लोग उनके बनाए वाद्यों के लिए संपर्क करते हैं। अलगोजा के साथ-साथ वे मटका और बाँसुरी जैसे वाद्य यंत्रों में भी निपुण हैं। उन्होंने राजस्थान डेजर्ट फेस्टिवल, ऑल इंडिया रेडियो, नेहरू युवा केन्द्र सहित कई प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दी है।
विदेशों में कार्यशालाओं के जरिए लोक कला का प्रचार
तगा राम भील ने फ्रांस, अमेरिका, जापान, रूस और कई यूरोपीय देशों में प्रस्तुतियों और कार्यशालाओं के माध्यम से राजस्थान की आदिवासी लोक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। सीमित संसाधनों और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी साधना से लोक संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
लोक कलाकारों को मिला राष्ट्रीय सम्मान
गफरुद्दीन मेवाती जोगी और तगा राम भील को मिला पद्म श्री सम्मान यह संदेश देता है कि भारत की लोक परंपराएं आज भी जीवित हैं और उन्हें संरक्षित करने वाले कलाकार राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं। यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों को भी लोक कला से जुड़ने और उसे आगे बढ़ाने की प्रेरणा देगा।


