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अजमेर में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र घोटाला: RPSC स्टेनो सहित चार गिरफ्तार

अजमेर में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र घोटाला: RPSC स्टेनो सहित चार गिरफ्तार

अजमेर में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाकर सरकारी नौकरी प्राप्त करने का संगठित नेटवर्क सामने आया है। पुलिस ने मामले में सिलसिलेवार कार्रवाई करते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह पूरा मामला तब उजागर हुआ जब राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) में दस्तावेज सत्यापन के दौरान संदिग्ध प्रमाण पत्र पर संदेह उत्पन्न हुआ। जांच आगे बढ़ी तो सामने आया कि प्रमाण पत्र पूरी तरह से फर्जी था और इसे तैयार करने में अस्पताल कर्मियों से लेकर ई-मित्र संचालक तक शामिल थे।

पहली गिरफ्तारी से शुरू हुई कार्रवाई: 2 फरवरी को RPSC स्टेनोग्राफर पकड़ा गया

पुलिस के अनुसार, इस मामले में पहली गिरफ्तारी 2 फरवरी 2026 को हुई। आरोपी अरुण शर्मा, जो RPSC में स्टेनोग्राफर पद पर कार्यरत था, ने नौकरी के लिए जो दिव्यांग प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया था, वह संदिग्ध पाया गया। जांच में यह दस्तावेज फर्जी साबित हुआ, जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया। इसके बाद 3 फरवरी को डेगाना के जावा निवासी ई-मित्र संचालक रामनिवास जाट को गिरफ्तार किया गया। 5 फरवरी को जेएलएन अस्पताल के ठेका कर्मचारी मोडू राम उर्फ मनीष को पकड़ा गया, और उसी शाम अस्पताल के सेवानिवृत्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दिलीप कुमार वैष्णव को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया।

मामले की शुरुआत: 13 अगस्त 2025 को दर्ज हुई थी रिपोर्ट

यह प्रकरण तब शुरू हुआ जब 13 अगस्त 2025 को RPSC के अनुवाद अधिकारी मुकुट बिहारी शर्मा ने सिविल लाइन थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई। दस्तावेज सत्यापन के दौरान अरुण शर्मा के दिव्यांग प्रमाण पत्र पर संदेह हुआ था। मामला दर्ज होने के बाद जांच की जिम्मेदारी सिविल लाइन थाना प्रभारी सब इंस्पेक्टर गिरिराज को सौंपी गई। तकनीकी और विभागीय जांच के बाद प्रमाण पत्र को फर्जी घोषित किए जाने के संकेत मिले, जिसके आधार पर पुलिस ने आगे की कार्रवाई शुरू की।

20 हजार में बना फर्जी प्रमाण पत्र, अस्पताल से ई-मित्र तक जुड़ी चेन

पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी अरुण शर्मा ने ई-मित्र संचालक रामनिवास जाट को लगभग ₹20,000 दिए थे, जिसके बदले में उसने फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र तैयार करवाया। रामनिवास ने आगे जेएलएन अस्पताल के ठेका कर्मचारी मोडू राम से संपर्क किया, जिसका काम दस्तावेज पर अस्पताल की मोहर और हस्ताक्षर लगवाना था।

आगे यह भी खुलासा हुआ कि मोडू राम ने 2019 में सेवानिवृत्त कर्मचारी दिलीप कुमार वैष्णव से संपर्क कर प्रमाण पत्र पर नेत्र रोग विभाग की सील और हस्ताक्षर करवाए थे। इसी फर्जी प्रमाण पत्र का उपयोग करके अरुण शर्मा को स्टेनोग्राफर पद का लाभ मिला।

सेवानिवृत्त कर्मचारी के घर से 27 से अधिक सरकारी सील बरामद

दिलीप कुमार वैष्णव की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उसके किराए के कमरे में तलाशी ली। यहाँ से 27 से अधिक सरकारी विभागों की सील बरामद की गईं। इनमें नाक-कान-गला, अस्थि रोग, नेत्र रोग सहित कई चिकित्सा विभागों की सील शामिल थीं।
बरामद सीलों में ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, पीसांगन की सील भी मिली, जिससे यह आशंका गहरी हो गई है कि इन सीलों का उपयोग अन्य फर्जी प्रमाण पत्र जारी करने में भी किया गया हो सकता है।

पैसों का बंटवारा: तीन स्तरों पर हुई लेन-देन की पुष्टि

प्रारंभिक पूछताछ में सामने आया कि ₹20,000 की राशि तीन स्तरों पर बांटी गई—

  • लगभग ₹10,000 मुख्य आरोपी को,

  • ₹8,000 दूसरे स्तर पर जुड़े व्यक्ति को,

  • और ₹2,000 प्रमाण पत्र पर फर्जी मोहर और हस्ताक्षर करने वालों में बांटे गए।

वर्तमान में अरुण शर्मा, रामनिवास जाट और मोडू राम न्यायिक अभिरक्षा में हैं, जबकि दिलीप कुमार वैष्णव पुलिस रिमांड पर है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इन सीलों का उपयोग कितने और किस प्रकार के दस्तावेजों में किया गया।

जेएलएन अस्पताल अधीक्षक का बयान: अस्पताल की आधिकारिक भूमिका संदिग्ध नहीं

जवाहरलाल नेहरू अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अरविंद खरे ने इस प्रकरण में अस्पताल की भूमिका स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि उन्हें इस मामले की जानकारी RPSC सचिव रामनिवास मेहता के लिखित पत्र से मिली। इसके बाद अस्पताल प्रशासन ने तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञों का एक मेडिकल बोर्ड गठित किया।

मेडिकल बोर्ड ने आरोपी अरुण शर्मा की विजुअल इवोक्ड पोटेंशियल (VEP) जांच जयपुर के एसएमएस अस्पताल में कराई। रिपोर्ट में पाया गया कि उसकी दृष्टि दिव्यांगता के निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है। पूरा मेडिकल रिपोर्ट RPSC को भेजा गया। अधीक्षक ने कहा कि उपलब्ध चिकित्सीय साक्ष्य यह साबित करते हैं कि व्यक्ति दिव्यांग श्रेणी में पात्र नहीं था। ऐसे में दिव्यांग प्रमाण पत्र पर अस्पताल की सील और हस्ताक्षर कैसे लगे, यह बड़ा सवाल है और जांच जारी है।

आगे की जांच में और गिरफ्तारियाँ संभव

सिविल लाइन थाना पुलिस यह जांच कर रही है कि बरामद सीलों का उपयोग कितने वर्षों तक और किन-किन दस्तावेजों पर किया गया। पुलिस का कहना है कि यह नेटवर्क काफी बड़ा हो सकता है और आगे और नाम सामने आने की पूरी संभावना है।

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