भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ रविवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल(Jaipur Literature Festival) में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका से जुड़े कई संवेदनशील और अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। भ्रष्टाचार, न्यायिक जवाबदेही, बेल कानून, राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के दुरुपयोग और उमर खालिद के जमानत मामले जैसे विषयों पर उनकी टिप्पणियों ने कानूनी और राजनीतिक हलकों में चर्चा को तेज कर दिया है। पूर्व सीजेआई ने साफ किया कि वे किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार को सही नहीं ठहराते, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया कि न्यायाधीश भी समाज से ही आते हैं और समाज की समस्याओं से पूरी तरह अलग नहीं होते।
भ्रष्टाचार और न्यायपालिका पर क्या बोले चंद्रचूड़
डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि वे भ्रष्टाचार को जस्टिफाई नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि जज भी उसी समाज का हिस्सा होते हैं, जहां भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि न्यायाधीशों से समाज की तुलना में कहीं अधिक उच्च नैतिक मानकों की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि किसी भी गलत फैसले को सीधे भ्रष्टाचार से जोड़ देना आसान है, लेकिन सच्चाई को समझना और जांचना ज्यादा जरूरी है। न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक प्रभावी और मजबूत सिस्टम की जरूरत है, ताकि गलत आचरण को रोका जा सके और ईमानदार जजों का मनोबल बना रहे।
उमर खालिद के केस पर पूर्व CJI का नजरिया
जब डीवाई चंद्रचूड़ से उमर खालिद के जमानत मामले पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस मुद्दे पर अब एक जज के तौर पर नहीं, बल्कि एक नागरिक के तौर पर बात कर रहे हैं। उन्होंने बेल कानून को सरल भाषा में समझाते हुए कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की बुनियाद “दोष सिद्ध होने तक निर्दोष” की अवधारणा पर टिकी हुई है। उनका कहना था कि किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले जमानत मिलना उसका अधिकार है। प्री-ट्रायल डिटेंशन को सजा के रूप में नहीं देखा जा सकता। अगर कोई व्यक्ति 5 से 7 साल तक अंडरट्रायल कैदी के रूप में जेल में रहता है और बाद में बरी हो जाता है, तो उस खोए हुए समय की भरपाई कैसे की जाएगी, यह एक गंभीर सवाल है।
बेल किन हालात में खारिज की जा सकती है
पूर्व सीजेआई ने बेल न देने के तीन क्लासिक अपवादों को उदाहरण के जरिए समझाया। उन्होंने कहा कि यदि कोई आरोपी सीरियल अपराधी है और उसके बाहर आने से समाज को गंभीर खतरा हो सकता है, तो बेल से इनकार किया जा सकता है। दूसरा कारण यह हो सकता है कि आरोपी बेल पर छूटने के बाद ट्रायल के लिए उपलब्ध न रहे और फरार हो जाए। तीसरा कारण यह है कि आरोपी सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता हो या गवाहों को प्रभावित कर सकता हो। अगर ये तीनों स्थितियां मौजूद नहीं हैं, तो सामान्य तौर पर बेल देना नियम होना चाहिए, न कि अपवाद।
राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों पर चिंता
डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि आज की बड़ी समस्या यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कानून कई बार “इनॉसेंस” की जगह “गिल्ट” की धारणा को आगे रख देते हैं। ऐसे मामलों में अदालतों की जिम्मेदारी है कि वे जांच करें कि क्या वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा शामिल है या नहीं और क्या डिटेंशन उचित और अनुपातिक है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो लोग सालों तक जेल में सड़ते रहेंगे, बिना ट्रायल के।
‘ट्रायल नहीं हो सकता तो बेल रूल है’
पूर्व सीजेआई ने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की एक बड़ी खामी यह है कि ट्रायल समय पर पूरे नहीं होते। यदि ट्रायल उचित समय में समाप्त नहीं हो पाता, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए “राइट टू स्पीडी ट्रायल” का उल्लंघन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भले ही कोई विशेष कानून बेल को सीमित करता हो, लेकिन संविधान सर्वोच्च है। अगर ट्रायल संभव नहीं है और बेल न देने के कोई ठोस अपवाद नहीं हैं, तो बेल मिलनी चाहिए। उमर खालिद के मामले में उन्होंने कहा कि पांच साल जेल में बिताना अपने आप में एक गंभीर मुद्दा है और इस स्थिति में अदालतों को एक्सपीडिशस ट्रायल या कंडीशनल बेल जैसे विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
जिला अदालतों और हाईकोर्ट पर टिप्पणी
डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि देश में जिला अदालतों और हाईकोर्ट में बेल न देने की एक आदत सी बन गई है, जो चिंता का विषय है। जिला अदालतें आम नागरिक का पहला संपर्क बिंदु होती हैं, लेकिन वहां जजों में यह डर रहता है कि बेल देने पर उनके इरादों पर सवाल उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट की छोटी-सी टिप्पणी भी ट्रायल जज के करियर को नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे प्रमोशन और प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। इससे एक ऐसा इकोसिस्टम बनता है, जहां जज डर के माहौल में फैसले लेते हैं, जो न्याय के हित में नहीं है।
न्यायिक प्रणाली में सुधार की जरूरत
अपने संबोधन के अंत में पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर किसी जज से गलती होती है, तो फैसले को पलटा जाना चाहिए, लेकिन नैतिक दबाव डालकर जजों को डराना ठीक नहीं है। न्यायपालिका को मजबूत बनाने के लिए भरोसे, पारदर्शिता और जवाबदेही का संतुलन बेहद जरूरी है।


