मनीषा शर्मा। रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और मानवीय संकट को गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन अब इसके असर प्रकृति और वन्यजीवों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। इस युद्ध के कारण केवल जमीन और समुद्र ही नहीं, बल्कि आसमान के पारंपरिक रास्ते भी असुरक्षित हो गए हैं। ब्लैक सी और पूर्वी यूरोप के एयर कॉरिडोर में लगातार सैन्य गतिविधियों और हवाई प्रतिबंधों के चलते प्रवासी पक्षियों के लिए जोखिम बढ़ गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि कई बाज़ और गिद्ध प्रजातियां, जिनमें संकटग्रस्त मिस्री गिद्ध भी शामिल है, अपने सदियों पुराने प्रवास मार्ग बदलने को मजबूर हो गए हैं।
मिस्री गिद्ध का बदले हुए प्रवास मार्ग और दक्षिण एशिया की ओर रुख
सेंट्रल एशियन वल्चर प्रोजेक्ट (2022–2025) के तहत किए गए नए शोध में यह सामने आया है कि 2022 के बाद से मिस्री गिद्धों ने ब्लैक सी बेसिन को लगभग पूरी तरह त्याग दिया है। पहले ये पक्षी यूरोप और ब्लैक सी क्षेत्र से होते हुए अफ्रीका या मध्य पूर्व की ओर जाते थे, लेकिन युद्ध के बाद अब वे कास्पियन सागर के ऊपर से उड़ान भर रहे हैं। इस नए मार्ग में कजाखस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान शामिल हैं। लंबी और चुनौतीपूर्ण यात्रा के बाद ये पक्षी पश्चिमी भारत, खासतौर पर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में शीतकालीन प्रवास के लिए पहुंच रहे हैं। यह बदलाव केवल एक क्षेत्रीय घटना नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव किस तरह से प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीवों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
राजस्थान बना सुरक्षित शीतकालीन आश्रय
शोध के अनुसार राजस्थान अब मिस्री गिद्धों के लिए सबसे महत्वपूर्ण शीतकालीन स्थल के रूप में उभरा है। यहां का शुष्क जलवायु, खुले मैदान, पशुपालन आधारित ग्रामीण व्यवस्था और अपेक्षाकृत सुरक्षित भोजन स्रोत इन पक्षियों के लिए अनुकूल साबित हो रहे हैं। सैटेलाइट ट्रैकिंग से यह पुष्टि हुई है कि अधिकांश गिद्ध राजस्थान के बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर जिलों में सर्दियों के दौरान लंबे समय तक ठहरते हैं।
चार वर्षों के इस अध्ययन में उज़्बेकिस्तान, कजाखस्तान और किर्गिज़स्तान से टैग किए गए 19 मिस्री गिद्धों पर नजर रखी गई। इनमें से 14 गिद्धों ने कुल 23 सफल प्रवास यात्राएं पूरी कीं। इन यात्राओं की औसत दूरी 2,663 किलोमीटर रही, जबकि सबसे लंबी यात्रा 6,873 किलोमीटर तक दर्ज की गई। यह आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि प्रवास के दौरान ये पक्षी अत्यधिक ऊर्जा, जोखिम और अनिश्चितताओं का सामना कर रहे हैं।
बीकानेर बना प्रवासी गिद्धों का प्रमुख केंद्र
अध्ययन में बीकानेर जिला सबसे बड़ा और स्थिर शीतकालीन केंद्र बनकर सामने आया है। यहां हर सर्दी में कई मिस्री गिद्ध लौटते हैं और लंबे समय तक ठहरते हैं। जोधपुर और जैसलमेर में भी युवा और उप-वयस्क गिद्धों की उपस्थिति दर्ज की गई है। हालांकि, इन इलाकों में पवन टरबाइन और हाई टेंशन बिजली लाइनों के कारण टकराव का खतरा भी बना रहता है, जो इनके लिए एक नई चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन क्षेत्रों में सही संरक्षण रणनीति अपनाई जाए, तो राजस्थान न केवल भारत बल्कि पूरे मध्य एशिया के लिए गिद्ध संरक्षण का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।
जोरबीर संरक्षण क्षेत्र का बढ़ता वैश्विक महत्व
बीकानेर स्थित जोरबीर कंज़र्वेशन रिज़र्व इस पूरे परिदृश्य में खास भूमिका निभा रहा है। कभी नगरपालिका की शवभूमि के रूप में पहचाना जाने वाला यह क्षेत्र आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण शीतकालीन प्रवासी स्थल बन चुका है। यहां केवल मिस्री गिद्ध ही नहीं, बल्कि स्टेप ईगल, सिनेरेस गिद्ध और अन्य बड़े शिकारी पक्षी भी बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार हर सर्दी में जोरबीर का आसमान पंखों की सफेदी से भर जाता है, जो एक अद्भुत पारिस्थितिक दृश्य प्रस्तुत करता है। यह दृश्य मध्य एशिया के पर्वतीय और स्टेपी इलाकों को राजस्थान के रेगिस्तान से जोड़ने वाली एक जीवंत कड़ी बन चुका है।
संरक्षण की बढ़ती जिम्मेदारी
मिस्री गिद्ध पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संकटग्रस्त प्रजाति माने जाते हैं। प्रवास मार्ग में बदलाव ने इनके सामने नई चुनौतियां और जोखिम खड़े कर दिए हैं। ऐसे में राजस्थान जैसे क्षेत्रों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, जहां ये पक्षी अब सुरक्षित शरण की तलाश में पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बिजली लाइनों को सुरक्षित बनाया जाए, भोजन स्रोतों को संरक्षित रखा जाए और मानवीय हस्तक्षेप को संतुलित किया जाए, तो यह क्षेत्र गिद्ध संरक्षण के लिए मिसाल बन सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध का यह अप्रत्यक्ष प्रभाव यह दिखाता है कि मानव संघर्ष केवल देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका असर प्रकृति और जीव-जंतुओं की दुनिया तक गहराई से पहुंचता है। राजस्थान के रेगिस्तान में उतरते ये प्रवासी गिद्ध इस बदलती वैश्विक सच्चाई के मूक साक्षी बन चुके हैं।


