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सोयाबीन किसानों पर दोहरी मार, MSP के बावजूद मंडियों में नहीं मिल रहे दाम

सोयाबीन किसानों पर दोहरी मार, MSP के बावजूद मंडियों में नहीं मिल रहे दाम

मनीषा शर्मा । राजस्थान के सोयाबीन उत्पादक किसानों के लिए यह साल लगातार संकट लेकर आया है। पहले बेमौसम बारिश ने फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया और अब सरकारी खरीद की सख्त शर्तें उनकी मुश्किलें और बढ़ा रही हैं। जिन किसानों को समर्थन मूल्य पर राहत मिलने की उम्मीद थी, वे अब निराश नजर आ रहे हैं। मंडियों में उन्हें अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे उनकी लागत तक निकलना मुश्किल हो गया है।

समर्थन मूल्य तय, लेकिन हकीकत अलग

सरकार ने सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,300 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है। इसका उद्देश्य किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाकर उनकी आय सुनिश्चित करना था। हालांकि जमीनी हालात इससे बिल्कुल अलग हैं। मंडियों में किसानों को 4,000 से 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तक ही दाम मिल पा रहे हैं। कई स्थानों पर इससे भी कम कीमतों पर फसल बेचनी पड़ रही है, क्योंकि सरकारी खरीद केंद्रों पर उनकी उपज गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतर रही है।

सरकारी खरीद शुरू, पर एक बोरी भी नहीं खरीदी गई

कोटा संभाग में सोयाबीन की सरकारी खरीद के लिए 18 नवंबर से पंजीकरण प्रक्रिया शुरू की गई थी। अब तक 118 किसानों ने पंजीकरण कराया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अभी तक एक बोरी सोयाबीन की भी सरकारी खरीद नहीं हो सकी है। खरीद केंद्रों पर पहुंचे किसानों को गुणवत्ता जांच में फसल फेल होने का हवाला देकर वापस लौटा दिया जा रहा है। इससे किसानों में भारी नाराजगी और निराशा देखी जा रही है।

बेमौसम बारिश ने बिगाड़ी फसल की गुणवत्ता

किसानों के मुताबिक बेमौसम बारिश सोयाबीन की फसल के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुई है। बारिश के कारण फसल में दाग-धब्बे पड़ गए, जिससे दाने की गुणवत्ता प्रभावित हुई। सरकारी खरीद के लिए तय किए गए सख्त गुणवत्ता मानकों पर यह फसल खरी नहीं उतर पा रही है। नतीजतन किसान खरीद केंद्रों से निराश लौट रहे हैं और उन्हें खुली नीलामी में अपनी उपज बेचनी पड़ रही है।

खुली नीलामी में भारी नुकसान

सरकारी खरीद में नाकामी के बाद किसानों के पास खुली नीलामी ही एकमात्र विकल्प बचता है। इस प्रक्रिया में उन्हें प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये तक का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है। कई किसानों का कहना है कि इस दाम पर उनकी लागत भी पूरी नहीं हो पा रही है। खाद, बीज, सिंचाई और मजदूरी पर किया गया खर्च निकालना मुश्किल हो गया है, जिससे किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ने की आशंका है।

नियमों में शिथिलता की मांग

किसानों का कहना है कि सरकार को प्राकृतिक आपदा को ध्यान में रखते हुए खरीद के नियमों में शिथिलता देनी चाहिए। उनका तर्क है कि जब फसल खराबी का कारण किसान की लापरवाही नहीं, बल्कि बेमौसम बारिश जैसी आपदा है, तो गुणवत्ता मानकों में कुछ ढील दी जानी चाहिए। एशिया की बड़ी अनाज मंडियों में शुमार कोटा की भामाशाह अनाज मंडी में पहुंचे किसान अपनी इसी मांग को लेकर प्रशासन से उम्मीद लगाए बैठे हैं।

टूटती उम्मीदें और बढ़ती चिंता

सोयाबीन किसानों की पीड़ा यह है कि मेहनत के बाद भी उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। एक तरफ कुदरत की मार और दूसरी तरफ व्यवस्था की सख्ती ने उन्हें दोहरी मार में डाल दिया है। यदि जल्द ही सरकारी स्तर पर कोई राहत नहीं दी गई, तो इसका सीधा असर किसानों की आर्थिक स्थिति और आगामी फसल की तैयारी पर पड़ सकता है।

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