मनीषा शर्मा। राजस्थान की राजनीति इन दिनों एक बड़े विवाद की चपेट में है। मामला सीधे तौर पर अजमेर जिले के ब्यावर से भाजपा विधायक शंकर सिंह रावत की बेटी कंचन चौहान से जुड़ा है। उन पर आरोप है कि उन्होंने नायब तहसीलदार के पद पर नियुक्ति पाने के लिए फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र का सहारा लिया।
सूत्रों के अनुसार, कंचन चौहान ने वर्ष 2024 में आयोजित राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की परीक्षा दी थी। इस परीक्षा में उन्होंने विशेष योग्यता (दिव्यांग) वर्ग के तहत आवेदन किया और इसी आधार पर चयनित हुईं। शिकायत में यह दावा किया गया है कि कंचन चौहान ने 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।
शिकायत सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंची
इस विवाद की चिंगारी तब भड़की जब शिकायतकर्ता फनीश नामक व्यक्ति ने सीधे राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से संपर्क कर पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में स्पष्ट तौर पर कहा गया कि कंचन चौहान ने झूठा प्रमाणपत्र बनवाकर विशेष आरक्षण का फायदा उठाया है।
इस शिकायत के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई और मामला राजनीतिक तूल पकड़ने लगा।
विधायक शंकर सिंह रावत का रुख – ‘नो कमेंट’
जब इस मामले पर मीडिया ने विधायक शंकर सिंह रावत से सवाल पूछा, तो उन्होंने प्रतिक्रिया देने से साफ इनकार कर दिया। NDTV राजस्थान से बातचीत में उन्होंने कहा:
“मुझे इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं देनी है। यह पूरी तरह से सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा है। दिव्यांग प्रमाणपत्रों की जांच और री-मेडिकल प्रक्रिया सरकार द्वारा की जा रही है। मैं इस पर कैमरे के सामने कुछ भी नहीं कहूंगा।”
उनका यह ‘नो-कमेंट’ रुख विपक्षी दलों को और अधिक हमलावर होने का मौका दे गया।
दस्तावेजों की जांच के लिए गठित की गई विशेष टीम
शिकायत मिलते ही प्रशासन हरकत में आया और सभी संबंधित कागजातों की जांच के आदेश दिए गए। सूत्रों के मुताबिक, एक विशेष जांच टीम का गठन किया गया है। यह टीम खासतौर पर राजस्व बोर्ड अजमेर से जुड़े दस्तावेजों और अभिलेखों की गहन पड़ताल कर रही है।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि दिव्यांगता प्रमाणपत्र पर लगी मेडिकल बोर्ड की मुहर और हस्ताक्षर संदिग्ध हैं। यही वजह है कि दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच तक की संभावना जताई जा रही है।
विपक्ष का हमला और भर्ती प्रक्रिया की साख पर सवाल
जैसे ही यह विवाद सामने आया, विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लपक लिया और सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग की। विपक्ष का कहना है कि यह मामला केवल एक उम्मीदवार या एक नियुक्ति का नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने आरोप लगाया कि अगर सत्ता पक्ष के लोगों के परिजन ही इस तरह आरक्षण का गलत फायदा उठाएंगे, तो आम उम्मीदवारों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।
राजनीतिक और सामाजिक असर
इस विवाद ने न केवल ब्यावर की राजनीति बल्कि पूरे राजस्थान में चर्चा का विषय बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगे चलकर भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है, क्योंकि मामला सीधे तौर पर एक भाजपा विधायक और उनकी बेटी से जुड़ा हुआ है।
सामाजिक संगठनों और दिव्यांग वर्ग से जुड़े लोगों ने भी आवाज उठाई है कि यदि कोई व्यक्ति झूठे दस्तावेजों के जरिए विशेष कोटे का फायदा उठाता है, तो यह असल में उन लोगों के अधिकारों का हनन है जिन्हें वास्तव में इस आरक्षण की जरूरत है।
आगे की संभावनाएं और जांच की दिशा
फिलहाल प्रशासन की ओर से जांच टीम अपने काम में जुटी है और सरकार की ओर से संकेत दिए जा रहे हैं कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।


