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डायबिटिक न्यूरोपैथी बन सकती है गंभीर खतरा, समय रहते पहचान जरूरी

डायबिटिक न्यूरोपैथी बन सकती है गंभीर खतरा, समय रहते पहचान जरूरी

आज के समय में डायबिटीज केवल एक सामान्य बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि यह दुनिया भर में तेजी से फैलने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। खराब खानपान, तनाव, शारीरिक गतिविधियों की कमी और बदलती जीवनशैली के कारण हर उम्र के लोगों में डायबिटीज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यह बीमारी केवल ब्लड शुगर बढ़ाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित करती है। इन्हीं गंभीर समस्याओं में से एक है डायबिटिक न्यूरोपैथी, जो धीरे-धीरे शरीर की नसों को नुकसान पहुंचाती है। यदि समय रहते इस बीमारी की पहचान और उपचार न किया जाए तो व्यक्ति को चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है और कई मामलों में स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार डायबिटिक न्यूरोपैथी ऐसी स्थिति है, जिसमें लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर शरीर की नसों को कमजोर और क्षतिग्रस्त कर देता है। शरीर की नसें हमारे मस्तिष्क और शरीर के अलग-अलग हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाने का काम करती हैं। इन्हीं नसों की मदद से हमें दर्द, गर्मी, ठंडक और स्पर्श का एहसास होता है। जब ब्लड में ग्लूकोज का स्तर लगातार अधिक बना रहता है तो यह नसों पर बुरा प्रभाव डालता है और धीरे-धीरे उनकी कार्यक्षमता कम होने लगती है।

इस बीमारी का असर सबसे ज्यादा पैरों, टांगों, हाथों और बाहों पर देखने को मिलता है। शुरुआत में रोगी को हल्की झुनझुनी, जलन, सुन्नता या दर्द महसूस हो सकता है। कई लोग इन शुरुआती संकेतों को सामान्य कमजोरी या थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन समय के साथ यह समस्या बढ़ने लगती है। कुछ गंभीर मामलों में रोगी को चलने में कठिनाई होने लगती है और संतुलन बनाए रखना भी मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि डायबिटिक न्यूरोपैथी केवल हाथ-पैरों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह पाचन तंत्र, दिल की धड़कन और शरीर की अन्य महत्वपूर्ण क्रियाओं को भी प्रभावित कर सकती है।

डॉक्टरों के अनुसार इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर रहना है। शरीर की नसों को सही तरीके से काम करने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण की जरूरत होती है, जो छोटी रक्त वाहिकाओं यानी केशिकाओं के माध्यम से पहुंचता है। जब ब्लड शुगर लगातार ज्यादा रहता है, तो ये केशिकाएं धीरे-धीरे खराब होने लगती हैं। इसके कारण नसों तक पर्याप्त पोषण और ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाता, जिससे वे कमजोर होने लगती हैं।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हाई ब्लड शुगर शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ाता है। इससे नसों के ऊपर मौजूद सुरक्षा परत को नुकसान पहुंचता है और नसों के सिग्नल भेजने की क्षमता प्रभावित होती है। धीरे-धीरे नसों के तंतु सिकुड़ने लगते हैं और शरीर के हिस्सों तक सही संकेत नहीं पहुंच पाते। यही वजह है कि मरीज को सुन्नता, जलन या चुभन जैसी समस्याएं महसूस होने लगती हैं।

डायबिटिक न्यूरोपैथी की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसमें कई बार रोगी की संवेदनशीलता कम होने लगती है। शुरुआत में हल्की झुनझुनी होती है, लेकिन बाद में व्यक्ति दर्द या तापमान को महसूस करना भी बंद कर सकता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक मानी जाती है, क्योंकि यदि पैरों में चोट, कट या छाले हो जाएं तो मरीज को तुरंत पता नहीं चलता। समय पर इलाज न मिलने पर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है और गंभीर मामलों में घाव गहरे होकर जानलेवा भी बन सकते हैं।

हर डायबिटीज मरीज को न्यूरोपैथी नहीं होती, लेकिन जिन लोगों का ब्लड शुगर लंबे समय तक नियंत्रित नहीं रहता, उनमें इसका खतरा काफी अधिक होता है। खासतौर पर पांच से दस साल या उससे अधिक समय से डायबिटीज से पीड़ित लोगों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। इसके अलावा मोटापा, शारीरिक गतिविधियों की कमी, हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान, शराब का सेवन और किडनी की बीमारी भी इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ भी नसों की कमजोरी बढ़ती है, जिससे बुजुर्ग मरीजों में यह समस्या अधिक गंभीर हो सकती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डायबिटिक न्यूरोपैथी को पूरी तरह रोकना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन सही जीवनशैली और समय पर सावधानी बरतकर इसके खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी है ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना। नियमित रूप से ब्लड शुगर और HbA1c की जांच करवाने से बीमारी की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है। डॉक्टरों की सलाह के अनुसार दवाइयों और इंसुलिन का सही तरीके से सेवन करना भी बेहद जरूरी है।

खानपान में सुधार भी इस बीमारी से बचाव में अहम भूमिका निभाता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि भोजन में फाइबर, साबुत अनाज, हरी सब्जियां, फल, प्रोटीन और हेल्दी फैट शामिल करना चाहिए। अत्यधिक मीठे, तले हुए और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाना जरूरी है। नियमित व्यायाम भी ब्लड शुगर नियंत्रण में मदद करता है। हर दिन कम से कम आधा घंटा पैदल चलना, योग करना या साइकिल चलाना शरीर में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर बनाता है और नसों को स्वस्थ रखने में मदद करता है।

डायबिटिक न्यूरोपैथी में पैरों की देखभाल को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इस बीमारी का असर सबसे पहले पैरों पर दिखाई देता है। मरीजों को रोज अपने पैरों की जांच करनी चाहिए ताकि किसी कट, छाले या सूजन का समय पर पता चल सके। पैरों को साफ और सूखा रखना, आरामदायक जूते पहनना और कभी भी नंगे पैर न चलना बेहद जरूरी माना जाता है। त्वचा को मुलायम बनाए रखने के लिए मॉइस्चराइजर का उपयोग भी फायदेमंद हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि डायबिटिक न्यूरोपैथी धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है, लेकिन समय पर सावधानी बरतकर इसके गंभीर प्रभावों से बचा जा सकता है। सही खानपान, नियमित एक्सरसाइज, तनाव नियंत्रण और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर डायबिटीज के मरीज बेहतर और सुरक्षित जीवन जी सकते हैं। शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करने की बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।

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